एक मृगनयनी चंचल, कोमल विचरण करती ह्रदय वन में,
एक मृगतृष्णा उसे पाने की ,पा कर उसके आनंद रूप को, स्वतः अंकुरित हो जाने की ,
एक मृगनयनी चंचल कोमल, विचरण करती ह्रदय वन में,

कुंदन सा बदन, चंचल चित्त मन, लताओं सी बल खाती हुई,
यौवन उसके हर रूप में, किसी नदी की तरह इठलाती हुई, धूप-छाव स्वतः हो जाती जब वो कमर को लचकाती,
एक मृगनयनी चंचल कोमल विचरण करती ह्रदय वन में,

मीन से भव्य कजरारे नयना, मन का चुरा लेते चैना, और व्याकुल कर देते मन,
पुष्प की भांति कोमल पंखुडियो से अधर, बढ़ा देते जिज्ञासा को, जैसे कोई अतृप्त खड़ा हो और जन्मो से प्यासा हो
एक मृगनयनी चंचल कोमल विचरण करती ह्रदय वन में,

कारे कारे उलझे गेसू जैसे सर्प चन्दन से लिपटा हो, कर्ण कुंडल ऐसे लगते जैसे पूर्ण चन्द्रमा दिखता हो,
मुख की लाली ऐसी है जैसे, अभी सूरज पूरब से निकला हो, एक मृगनयनी चंचल कोमल विचरण करती ह्रदय वन में,

हंसती हुई वो ऐसे लगती, जैसे मंद मंद स्वप्न में कोई हँसता हो, कभी जो वो खिल खिला कर हस दे, मूर्छित प्राणी भी जिन्दा हो ,
पग पग उसका मद से भरा, चलती हो जैसे कोई अप्सरा, एक मृगनयनी चंचल कोमल विचरण करती हृदय्वन में,

मैं जन्मो जन्मो से व्याकुल, ढूंढ़ रहा उसे ह्रदय वन में, काश कभी यूँ ही मिल जाये विचरण करती उपवन में,
एक दूजे के पूरक हो जाये, शांत हो मृगतृष्णा भी, एक मृगनयनी चंचल कोमल आ जाये जो जीवन में…

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