एक कहानी
लिखने से पहले
वे संबधों के बीच तैरे थे
उस रात,
डूबे रहे सुबह तक।
अब सुबह लिख रहे हैं।
एक कहानी
सेक्स, क्राइम में
एक लड़की
उसकी जिंदगी के हिस्से
फाड़ रहे थे पन्ने
संवेदना के गाढ़े अक्षरों में
छिपा रहे थे
नैपथ्य का सत्य।
स्वयं को व्यक्त कर रहे थे,
बलात्कार, हिंसा
उछलते शब्दों को
कोस रहे थे समाज को।
अश्लीलता का जाल
साहित्य में सीधे—सीधे
फैलने से उनका लेना देना नहीं
नब्ज टटोल चुके थे—
बेचने के अर्थशास्त्र में
उतार रहे थे कविता कहानी
मन से,
बदलते चेहरों मे शामिल
पलभर में अंदरखाने में
खेल रहे थे हाड़मांस से।
सच नैपथ्य में,
जनता सच ढूंढ रही थी।

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