भूल जा प्रेम

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भूल जा प्रेम

By |2019-01-09T00:02:21+00:00January 9th, 2019|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

बार-बार की आदत
प्रेम में बदल गया
आदत ही आदत
कुछ पल सबकी की नज़रों में चर्चित मन
सभी की ओठों में वर्णित प्रेम की संज्ञा
अपने दायित्त्व की इतिश्री, लो बना दिया प्रेमी जोड़ा
बाज़ार में घूमो, पार्क में टहलों
हमने तुम दोनों की आँखों में पाया अधखिला प्रेम।
हम समाज तुम्हारे मिलने की व्याख्या प्रेम में करते हैं
अवतरित कर दिया एक नया प्रेमी युगल।

अब चेतावनी मेरी तरफ से
तुम्हारा प्रेम, तुमहरा नहीं
ये प्रेम बंधन है किसी का
अब मन की बात जान
याद करों नदियों का लौटना
बारिश का ऊपर जाना
कोल्हू का बैल बन भूल जा, भूल था ।
जूठा प्रेम तेरा
सोच समझ
जमाना तैराता परम्परा में
बना देती है प्रेमी जोड़ा
बंधन वाला प्रेम तोड़
बस बन जा पुरातत्व
अब बन जा वर्तमान आदमी
छोड़ चाँद देख रोटी का टुकड़ा
फूल ले बना इत्र, बाज़ार में बेच
कमा खा, बचा काले होते चेहरे
प्रेम याद , याद भूल
देख सूरज, चाँद देख काम
रोटी, टुकड़ा और ज़माना
भूला दे यादें प्रेम की।

– अभिषेक कान्त पाण्डेय

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About the Author:

शिक्षा— पत्रकारिता एवं जनसंचार में इलाहाबाद विवि से परास्नातक, फोटोजर्नलिज्म एंड विजुअल कम्यूनिकेशन में डिप्लोमा, शिक्षा में स्नातक, केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा उतीर्ण, कंप्यूटर में सर्टिफिकेट कोर्स। अनुभव— विभिन्न अखबार व मैग्जीन में संपादकीय सहयोग, एनजीओ में मीडिया एडवोकेसी, पत्रकारिता एवं अन्य विषयों में अध्यापन, न्यू इंडिया प्रहर मैग्जीन में समाचार संपादन कार्य। विभिन्न सम्मानित पत्र—पत्रिकाओं में कविता व लेख, स्वंतत्र लेखन, वेब व पोर्टल पर विभिन्न समसामयिक मुद्दों पर सक्रिय लेखन।

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