एक उपहार

जन्मदिन विशेष पर एक गुरु के बचपन के साथ उनके आज को प्रदर्शित करती एवं शिष्य के द्वारा गुरु को समर्पित मेरी ये कविता:

प्रेम की बगिया में, एक कली जो खिली
है चली मस्तानी हवा रे, हौले हौले से चली
हुआ रौशन जहाँ, महकी गुलिस्ताँ की हर गली
पहले पहल जो देखी भोली सूरत तेरी
आई खुशियों की बहारें, झूमें है मन की जमी
है दिख रही एक कली, जो आज ही खिली…
प्रेम की बगिया में, एक कली जो खिली

जो तू हँस दे हो जायें सब निहाल
तू मुस्कुराये यूँ बार बार
कितनी भोली है तू लगे प्यारी है तू
बनके प्रेम बदरिया जो तू सावन सी है बरसे
आँगन भी चहके है दामन भी महके
हाँ वारे जायें तुझपे सौ बार
प्रेम की बगिया में एक कली जो खिली

थी कभी थाम उंगली मात-पिता की चली
आज आप यूँ पथ में अटल हैं खड़ी
बनके मार्गदर्शक आप जो हमको मिली
एक पल को यूँ लगा जैसे सपने मिले
सुक्रिया आपका जो गुरुवर बनकर हमें हैं मिले
राह अपनी हम आपके मार्गदर्शन में बढ चले हैं
भरा हो ख़ुशी से आपका,
ज़िन्दगी का हर सफरनामा
मुबारक हो आपको ये जन्मदिन सुहाना
प्रेम की बगिया में एक कली जो खिली
हमेसा यूँ ही गूंजती रहे,
आसमा तक उसकी(आपकी) हँसी

सुबोध उर्फ़ सुभाष

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