वो बचपना शरारतें गुस्ताखियां शायद कम हुई होंगी।
वो इश्क़ वो अदाएं वो बेचैनियां शायद कम हुई होंगी।

बदल तो गयी है बहुत वो दूर होकर मुझसे पर ।
गुजरती होगी बाग से तो कलियां अब भी खिलती होंगी।।

सादगी है उसके बदन पर,गजाल सी आंखे है ।
फिर भी निगाहे उसकी अब भी दिल चीर देती होंगी।।

उसका मुस्कुराना तो आज भी याद है मुझे पर ।
वो हँसती होगी अब भी तो बहार आ जाती होगी।।

यूँ तो इश्क था उसे मुझसे पहले भी बहुत पर ।
शायद मेरी याद अब भी उसकी आंखे भर देती होंगी ।।

उसकी जुल्फों को अपनी उँगलियों से संवारा है मैंने ।
उसकी लटकनें अब तो खुद ब खुद संवरती होंगी।।

उसका चेहरा जो मुझे देखकर खिलखिला जाता था ।
शामो सहर अब तो उसपर भी उदासी छाई होगी।।

ये मुमकिन नही कि मुक्कमल हर इश्क़ हो जाये ।
हाँ! वो आज भी सीसे में मुझे देखकर मुस्कुराती होगी।।

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