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खिचड़ी तेरे रूप अनेक

खिचड़ी तेरे रूप अनेक

संक्रांति और खिचड़ी (जिसके रूप अनेक)
खिचड़ी का इतिहास बहुत पुराना है।प्राचीन काल से तथा मुगलों के समय में भी यह रसोई की शोभा बढ़ाती रही है। आयुर्वेद में तो इसे बहुत ही पोषक आहार माना गया है। बच्चों का शुरुआती भोजन भी खिचड़ी ही है। गरीबी की आहार (आन), बीमारी में जान, छोटे बच्चों और बुढ़ापे में जहान और अब तो भारत की राष्ट्रीय भोजन की पहचान बन चुकी है, खिचड़ी। पेट को अति प्यारी सुपाच्यता की आधार, व्याधि को भगाने वाली खिचड़ी, पूरे देश भर में सामूहिक रूप से खाई, बनाई, परोसी व पसंद की जाती है।मुख्य रूप से उत्तर भारत की डिश है,लेकिन अलग अलग दालों के प्रयोग से दक्षिण भारत तक खाई जाती है। दाल,चावल और कुछ मसालों से ही, कम समय व कम खर्च में बन जाती है। कई लोगों के दिमाग में खिचड़ी पकती रहती है, उन्हें इस खाने से शायद परहेज होता हो तभी तो, रसोई में नहीं पकाते…. खिचड़ी इतनी सेहतमंद है, फिर भी कई लोग इसे खाने के नाम पर नाक भौंह सिकोड़ते हैं। इसमें मौसम की सब्जियां डाल कर पकाएं, सामान्य हींग जीरे का छौंक लगाएं या चटपटी गरम मसाले से युक्त, स्पाइसी खिचड़ी का आनंद लें। संपूर्ण आहार है खिचड़ी। सादी सी खिचड़ी अनेक प्रकार से बनाई जाती है। सबके अपने अलग तरह का आचार, विचार, स्थान, मौसम के अनुसार बनती है खिचड़ी। मकर संक्रांति पर खाने वाली, दान वाली, दहेज में आने वाली, रस्म अदायगी में बहू द्वारा बनने वाली खिचड़ी, सबके अपने स्वाद हैं खिचड़ी को खाने, बनाने के भी अपने कई तरीके हैं। कहते हैं
घी बनावै खिचड़ी,नाम बहू का होए।
खिचड़ी के हैं चार यार,
घी,पापड़, दही, अचार।
छत्तीस व्यंजन खाकर जब पेट खराब हो जाए,और जीभ का स्वाद देह पर भारी पड़े, तब खिचड़ी ही है जो भूख भी तृप्त करती है, तथा रोग से भी राहत देती है। इस तरह यह हर तरह से आन बान शान से युक्त अमीर, गरीब सबके लिए मनभावन व्यंजन है। जब पेट में भारीपन, एसिडिटी, या तलाभुना खाने से अपच हो गई हो तो मूंग की दाल की खिचड़ी इन वाले रोगों का सटीक प्राकृतिकउपचार है।
मकर संक्रांति पर खिचड़ी साबुत कच्ची व पकी हुई ,दोनों तरह की खिचड़ी दान करने की परंपरा है।वृंदावन में बिहारी जी के मन्दिर में खिचड़ी महोत्सव में भी इन दिनों खिचड़ी का ही भोग लगाया जाता है। साईं बाबा की खिचड़ी भी खूब प्रसिद्ध है। राजस्थान में खीचड़ा भी बनने में आता है। पोंगल पर बनने वाला पकवान भी खिचड़ी से मिलता जुलता ही है। व्रत में खाई जाने वाली साबूदाने की खिचड़ी भी कम लाजवाब नहीं है। अपनी पसंद अनुसार सब्जियां, मसाले, मूंगफली, दालें, घी का प्रयोग कर स्वादिष्ट बनता जा सकता है। इस तरह की खिचड़ी को यू.पी. में तहरी नाम दिया गया है। सर्दियों में बनने वाली बाजरे की खिचड़ी भी बहुत ही स्वादिष्ट व स्वासथ्यवर्ध्दक है। इसे गर्म गर्म दूध के साथ मिलाकर गुड़, चीनी से खाएं या फिर गाय के घी के साथ आनंद लें। खिचड़ी पर बने मुहावरों पर भी गौर फरमाएं
घी गयो खिचड़ी में,
क्या खिचड़ी पक रही है,
समरसता की खिचड़ी,
सियासी राजनीति की दलगत खिचड़ी,
घी खिचड़ी होना,
बीरबल की खिचड़ी होना।
हर देश का अपना एक खास कुजीन होता है। सभी देशों में वहां के लोगों की पसंद के अनुसार ही किसी व्यंजन को नेशनल कुजीन में लिया जाता है।इससे उस डिश की पहचान या महत्व पर कोई फर्क नहीं पड़ता। खिचड़ी के साथ भी ऐसा ही है। खिचड़ी को,भारतीय कुजीन का दर्जा महज गुडफूड मानकर ही दिया जा रहा है।
अगर खिचड़ी को लेकर कोई मुहावरा या जानकारी हो तो, कृपया शेयर करें।

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