हिंदी के सम्मान में कुछ काव्यात्मक व्याख्यान करूँ,
कभी दिनकर, कभी प्रेमचंद, कभी निराला का आह्वान करूँ|
यूँ तो हिंदी हर रग में है, पर कवियों के लिए बनी जान है हिंदी,
कभी दिखती दोहों में तो, छन्दों की बनी शान है हिंदी|
कभी दर्शाये गीतों को तो, कभी पाठ का पद्यांश है ये,
मुझ अदने से कवि के लिए, सारे जीवन का सारांश है ये|
हे तुलसी के श्री राम प्रभु, सूरदास के नटखट कृष्णा,
हिंदी में मुझे परिपक़्व करो, दूर करो मेरी ये तृष्णा|
सच्ची महत्ता बखान करूँगा, जब हिंदीभाषी बन जाऊंगा,
सरल ह्रदय हो जायेगा मेरा, में भी मृदुभाषी कहलाऊंगा|

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