बदलता आदमी

बदलता आदमी

लोग कहते है कि इश्क़ में बर्बाद हो गया ।
कुछ जख्म है जिंदगी के कि मैं शायर हो गया ।।

हमदर्द बने फिरते है कई दिखावे के बाजार में
जिसने भी समझा है इसे वो अकेला हो गया।।

दुश्मनो को तो फिर भी हरा देता मगर।
दोस्त ही आजकल आस्तीन का सांप हो गया।।

रोता रहा है वो बच्चा मुफलिसी में अकेले मगर।
रोड पर एक सिक्का क्या मिला हुजुमे यार हो गया।।

मरते रहे लोग और वो बेखौप देखता रहा।
पहले हमदर्द था आदमी अब खुदगर्ज हो गया ।।

नजरे उसकी अब हर तरफ जिस्म टटोलती है।
पहले राम था वो अब शायद रावण हो गया ।।

बदलता है वो इश्क़ और वादों से भी मुकर जाता है।
मोहब्बत में भी अब सरकारों का असर हो गया ।।

ढूंढकर भी देख लिया उसने उसको खुद में भी
शायद जमीर उसका अब उसके अंदर ही सो गया ।।

लौट आता था जो पंछी सांझ को उस पेड़ पर
अब नही दिखता लगता है परो पर गुमां हो गया।।

इक तेरी रहमत का असर होने लगा है खुदा
कहां तो जुगनू था मैं और अब चाँद हो गया।।

प्रियांश शर्मा

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