कटु लेकिन सत्य है
बेटियाँ समझी जाती हैं आज भी पराई
आज शिक्षित होने का दम्भ भरता है समाज
नहीं है सुरक्षित फिर भी नारी का सम्मान
सच्चाई क्यों मुँह छुपाकर रोती है
झूठ की ही क्यों हर जगह पूजा होती है
पडोसी को पीड़ा हो रही बहुत
उसकी थाली में मुझसे ज़्यादा रोटी है
कटु, लेकिन सत्य है

रो रही मानवता, छल फरेब हँस रहा है
क्या कीमत रह गयी ईमान की
सोच इतनी तुच्छ हो गयी इंसान की
काटते हैं अपनी जड़े, बनते हैं बड़े बड़े
हो रही जय यहाँ बेमान की
लेकिन गुलाब काँटों में ही खिलते है
दर्द अपनों से ही मिलते है
सफलता उन्ही को मिलती है
विश्वास की डगर पर
जो मुस्कराकर चलते हैं

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