ये शाम कब होती है,
दोपहर के बाद?
पर अब कहाँ,
शामें तो वर्षों पहले हुआ करती थीं…

उसका इंतज़ार रहता था,
खेलकूद जो होता था,
मित्रमंडली जमती थी।

दिन तो काटे नहीं कटती थी,
सज़तीं थी,
वो शामें,
जमती थीं,महफिलें।

महफिलों में,वो ठिठोलियां,
वो हँसी,
वो चाय की चुस्कियां।

पश्चिम में सूरज की लालिमा,
अब कहाँ,
कब अस्त होता है दिवाकर?

शाम को,
कब होती है ये शाम?
अब तो सुबह,
कार्यशील सुबह के बाद,

सीधे रातें आती हैं,
थकी-थकी ये रातें।
शामें तो वर्षों पहले हुआ करती थीं…
शामें तो वर्षों पहले हुआ करती थीं…

-सन्नी कुमार सिन्हा

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