हमारी सादगी हमारी सजा बन गयी
फूल भी मिला तो कांटे की तरह
हम खुशबु लुटाते रहे उम्रभर
मन प्यासा रहा सागर की तरह
सबको अपनाया आगे बढ़कर
सबने छला गैरो की तरह
भरोसा करने की सोचे भी कैसे
देखा है सपनो को टूटते हुए कांच की तरह
शिकायत किसी से करें भी क्या
अपने भी मिलते हैं यहाँ गैरो की तरह
फूल गिला भी क्या करे
जब माली ही तोड़ दे तिनके की तरह
नदी मिलने को आतुर है सागर से
चांदनी मिलती है चकोर से जिस तरह
पिघलती है मोम लौ जलाय रखने के लिए
जलती है बाती दीपक की जिस तरह

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