मैं फ़कीर,
निरंतर निषाद,
तत्पर हूं न अवसाद,
कल की जो है बात,
सोशल मीडिया की गपशप से,
आदत है जो तेरे लड़ने की उससे,
बात कुछ जो हलक से न उतरे,
उसी से शायद तुम उतरे,
सही, मैं फ़कीर निरंतर निषाद।
नाम से हूँ,
या काम से हूँ,
कर्म से हूँ,
या अपने धर्म से हूँ,
इन उभरी हुई बातों से लड़ने पर भी मैं हूं,
शब्दों को सरल कहने मैं में हूँ,
गंभीर नहीं,
सरल सही,
कलम कहीं न कहीं,
सही होगी वो प्रसाद,
मैं फ़कीर निरंतर निषाद।

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