ओ साथी मन के मुझे चाँद के परे ले चल

ओ साथी मन के मुझे चाँद के परे ले चल

ओ साथी मन के मुझे चाँद के परे ले चल,
वहीं बिताएंगे हम फुर्सत के कुछ पल
नज़र लग जाया करती है प्यार को खुलेआम यूँ,
रिवाज़ों का डर है, है यहाँ भेदभाव की हलचल
ओ साथी मन के मुझे चाँद के परे ले चल
गिरेबान मैं झांकती नज़रें कुछ में बहशी हवस
डराते से लगतें हैं अज़ब से सायें मुझे हर पल
मुझे तो रहना वहीं जहाँ तू और में हूँ केवल
ओ साथी मन के मुझे चाँद के परे ले चल

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Rahi Mastana

Part time writer/Author/Poet

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