घर लौट के कैसा लगता है, पूछो उस वीर जवान से, 
शेरों की भांति निडर खड़ा रहा, नहीं धमका पाक़िस्तान से|
गैर मुल्क में घुस पड़ा था, अपना सीना तान के,
पुर्जे पुर्जे हिले दिए थे ,उस पाक़िस्तानी यान के |
आंच तक नहीं आने दी, उस भारत माँ के लाल ने,
हर मुश्किल का किया सामना, मूछें भर ली थीं ताव से |
में भारत का बेटा हूँ, ज़ुल्म हर सह जाऊंगा,
क्यों आया, क्या करने आया हूँ, ये नहीं बतलायुंगा |
ऐ मौक़ापरस्त वतन के आका, वो दिन भी आ जायेगा,
मुहं झुका के तू फ़िर मुझको, मेरे वतन ले जायेगा |

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