ज़िंदगी तू कहाँ खो गयी, मैं तुझको ढूँढा करता हूँ,

ज़िंदगी तू कहाँ खो गयी, मैं तुझको ढूँढा करता हूँ,

ज़िंदगी तू कहाँ खो गयी, मैं तुझको ढूँढा करता हूँ,
अक़्सर ये सवाल मैं, अपनेआप से किया करता हूँ,
क्यों मैंने खोया है इसको, क्या ये मेरी ही खता है,
क्यों बुझा बुझा सा रहता हूँ, क्या तुझको ये पता है|
बचपन बीता और जवानी ढल गयी, जाने कैसी होड़ में,
अपनी मैं में मैं रहा, व्यस्त रहा पैसों की दौड़ में|
तिरस्कार कर दिया अपनों का, कितनों का दिल तोड़ दिया,
भागा फिरा झूठे सपनों में, अपनों का सुख छोड़ दिया|
अब पछताता फ़िरता हूँ, सवाल ख़ुद से किया करता हूँ,
आ लौट के आ ज़िंदगी, मैं तुझको ढूँढा करता हूँ|

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Rahi Mastana

Part time writer/Author/Poet

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