” ‘आरव ! आरव ! ‘सुनो न ,मै आटा गूँथ रही हूँ ,तुम प्रिंस को देख लो ना प्लीज़। ” आरव चला ही था प्रिंस को देखने कि आरव की माँ शुरू हो गयी -” आरव तो जोरू का गुलाम है ,सारे दिन ऑफिस में काम करता है ,फिर बच्चे को भी संभाले। बहु तो निकम्मी है। पढ़ी -लिखी बहु लाकर मैं तो पछता रही हूँ। एक बच्चा भी नहीं संभालता इस महारानी से ,हमने तो पांच बच्चे पाले हैं। ” आरव माँ के डर से अपने बैडरूम में चला जाता है और टीवी देखने लगता है। बहु बेचारी पहले आटे के हाथ धो प्रिंस को फ्रेश करती है ,फिर बेडरूम में जाकर आरव से पूछती है -” तुम इतना भी सहयोग नहीं कर सकते आरव ?” कान लगाकर सुन रहे ससुर बहु के रूम से निकलते ही शुरू हो जाते हैं भड़काने -” कैसे बर्दास्त करता है तू इसे ,हम तो एक पल भी नहीं कर सकते। पढ़ी -लिखी है तो पति से काम कराएगी क्या ? किस बात का गुरुर है इसे घर का काम भी होता ,बच्चा भी नहीं संभालता। तू कैसे झेलता है आरव इसे ,मेरे बेटे की तो किस्मत फूट गयी पढ़ी -लिखी लड़की से शादी करके। ” बहु से -” किस बात का घमंड है तुझे ,कुछ कमाकर तो लाती नहीं ,मेरे बेटे की कमाई खाती है ,उसी पर गुर्राती है। अपनी सास से सीख ,चालीस हज़ार पेंशन घर बैठे मिलती है ,सरकारी टीचर थी ,पांच -पांच बच्चे पाले। मेरे बेटे को जहर दे दे ,पीछा छोड़ इसका। इससे तो किसी अनपढ़  शादी करते  हम अपने बेटे की। ”
बहु रोते हुए अपने कमरे में चली जाती है ,उसे सास -ससुर के अपशब्द बोलने का इतना दुःख नहीं ,जितना दुःख अपने पति की ख़ामोशी का है ,क्यों नहीं आरव ने कहा कि उसे कोई समस्या नहीं अपनी बीबी से तो आप क्यों बतंगड़ बना रहे हैं ज़रा सी बात का। क्यों चुपचाप सुनता रहा आरव अपनी बीबी की बुराई ?क्या गुनाह किया मैंने बस बच्चे को देखने को ही तो बोलै था !इतनी सी बात पर इतना बबाल इतना अपमान। छह साल हो गए शादी को पर कुछ भी तो नहीं बदला ,आरव कभी मेरा साथ नहीं देते ,सास -ससुर के लिए बस मैं नौकरानी हूँ ,आज तक परिवार  सदस्य नहीं समझते मुझे। रोज़ -रोज़ ताने नहीं सहे जाते अब ,बस बहुत हो चूका अब आरव से बात करनी ही होगी। पढ़ी -लिखी बहु  इतनी समस्या थी तो क्यों नहीं की किसी अनपढ़  से शादी ?पर आरव तो अपने माँ -बाप का नाम सुनते ही चीखने -चिल्लाने लगते हैं ,मेरी बात सुनते ही नहीं क्या उनको दिखाई नहीं देता अपने -माँ बाप  का अत्याचार ,क्यों नहीं बोलते कभी मेरे पक्ष में ?अगर पति साथ दे तो ससुराल  में किसी  की हिम्मत नहीं पत्नी का अपमान करने की। यह भी तो घेरलू हिंसा है। रोज़ रोज़ मानसिक शोषण। नहीं चाहिए ऐसा पति और ऐसा ससुराल जो छह साल में मुझे अपना ही ना पाए उन्हें तो बस गूंगी – बेहरी कामवाली बहु चाहिए। बहु अपना सामन पैक करने लगती है ,एक नयी शुरुआत के लिए ,सम्मान से जीने के लिए।

यह मेरा पहला प्रयास है लघुकथा लिखने का। महिला दिवस पर एक सामाजिक समस्या को उठाया है दोस्तों आज भी अनेक रूढ़िवादी घरो में बहु को सिर्फ नौकरानी ही समझा जाता है। अश्लील गलियां ,अपशब्द बोलना भी घरेलु हिंसा है। कब बदलेगी समाज की सोच। अपनी प्रतिक्रिया से ज़रूर अवगत कराएं ,,,

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