भूल गए हैं!!
छुट्टी से पहले
स्कूल में होली मनाना,
पैन की स्याही,पानी वाले गुब्बारे
और बड़ी मेहनत से लिखे
उल्टे शब्द वाले आलू से छाप लगाना।

भूल गए हैं!!
ताई, चाची, बहुओं को,
जो सेंकती थी, रात को गुझिया
और हम करते होली की तैयारी,
दोस्तों की टोली और,
हुड़दंगी यारी।

भूल गए हैं!!
शकरपारे के स्वाद,
चखने के बहाने, बनाते बनाते
गरम गरम ही खा जाना,
गुझिया, सेव, पापड़ और
खट्टी कांजी चटकारी।

भूल गए हैं!!
कीचड़ मिट्टी वाली होली,
करना नई भाभी को,
रंगों से सरोबार,
फिर देना फगुआ,
ये रिवाज थे, मनोहारी।

भूल गए हैं!!
शाम को सब के यहां बारी बारी
मिलने जाना,
पैर छूना, गले मिलना।
सबके यहां
अलग अलग स्वाद
इसी में हफ्तों गुजर जाना

अब बस याद है!!
जैसे तैसे मिली,
एक दिन की छुट्टी
उसमें भी लगता
जैसे निभा रहे ड्यूटी
बच्चों को पहना बरसाती
पानी से भी है बचाना
होली का टाइम भी है फिक्स
उसके बाद, नहा धो सो जाना।
शाम को, स्वयं को बेहतर
प्रस्तुत करने का मौका, या देखना
किस से हैं सम्बन्ध बढ़ाना।
कैटर निर्मित
होली मिलन का खाना
अबकी बार किसको है चुना जाना।
सोसायटी, मुहल्ले के
अध्यक्ष, सचिव पद के लिए
उसकी जुगत भी लगाना।
ना किसी की मान मनुहार
पैसे दिए हैं तो खाना ही है खाना।
पुते चेहरे, खींसे निपोर
बनावटी मुस्कान लिए
फिर मिलते रहने के वादे के साथ
आ जाते हैं फिर अपनी चौखट द्वार।

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