चल ऐ सुरज तुभी डुब जा
मै भी डुब जाता हुुं,
थक चुका हुं इस डगर पर
जीवन को भुल जाता हुं

बचपन कितना सुहाना था
शरारत पर मा का आंचल बहाना था,
पिता के कंधो पर की वो सवारी
बनाकर घोडा भी की थी सवारी,

जब उनको काम पर जाते देखता था
मै भी कुछ बनुंगा ख्वाब ये देखता था,
बडे आदमी का ख्वाब हलाहल विष बन गया
आधा बचपन किताबो के भार मे दब गया,

होते ही बडे ये जीवन
देखो कितना बदल गया,
जीन हाथो को पकडकर
चलना फिरना सीखा
उन्हे ही कह दिया बदल जाऔ
देखो जमाना भी कितना बदल गया,

ना रहा कोई दोस्त और रिश्ता
अब ना अब पहले टोलियो का समय रहा,
भाग-दौड के इस जीवन मे
विकेंड का ही अब समय रहा,

बदल गये हालात भी कितने देखो
जीवन भी नही रहा अब जीना,
किसी एम.एन.सी. का ये देखो
मल्टी टास्कींग जॉब हे बन गया,

पैसा कमाने की हुल्लड मे
देखो हम दौड रहे हे,
गिर रहा मानव का मुल्य
भौतिकता मे खुद को छोड रहे हे,

हो गये बिजी इतना की
रिश्ते नाते छोड रहे हे,
फ्लैट हो गया घर हमारा
संस्कार भी कम्प्युटर पर छोड रहे हे,

थक गया हु इस जीवन से मैं
ना जाने किस दौर से गुजर रहा हुं,
देखता हु तुझको तो ऐ सुरज लगता हे
जैसे मैं अंधकार में डुब रहा हु..

#Deepak_UD

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