रिश्तों में हर रोज घटास होता है
यहां अपनो के बीच अक्सर।।

हर एक रिश्तों को आज़माते हैं लोग
खुद को इंतिहान से बचा न पायेगा।।

रिश्तों को जल की तरह साफ रखते हैं
शाख बनाने में लगे हुए है लोग यहां।।

मत सोच सच्चाई की राहों में डटा रह
रिश्तेदारों से बेख़ौफ़ रह तू रिश्ते निभा।।

मुक़द्दर में तेरा ‘प्रेम’ भरा है तेरा वक्त है
सच्चाई के साथ रिश्तों को निभाता जा।।

प्रेम प्रकाश
पीएच.डी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय रांची

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