प्रकृति का प्रकृति पे कहर

प्रकृति का प्रकृति पे कहर

रात को फिर पेड़ों ने आंधियों के साथ बतकही हुई
हवाओं ने अपना जोर आजमाया कल शायद

ले गया छोटे पेड़ को अपने लड़कपन में शायद
आज इश्लिये पेड़ों ने मौन धारण कर लिया शायद

तेरी इसी बेबाकी में न जाने कितनों घरों को उड़ाया
शायद अब आंधियों के कलेजे को शीतल मिल गया

मुझे मालूम है चिड़ियों का बसेरा विलुप्त हो गया
मगर इतनी बेरूखी क्यों हमसे या उस प्रकृति से

तिनका-तिनका जोड़ के वें अपना घर बनाएं होगें
सर से उनके बच्चों का बसेरा उड़ा दिया तुनें ए आंधी

प्रकृति ने तुझे भी बनाया उसे भी और मुझे भी
तुझे किस बात का गरूर है ये आंधी जो घमंड

घबरा मत ‘प्रेम’ में सब का भलाई है ए आंधी
ये धरती और ये प्राकृति ने हमसब को बनाया
प्रेम प्रकाश
पीएच.डी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय रांची झारखंड भारत।

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

Leave a Reply

Close Menu