गांव का सुकून

गांव का सुकून

गांव में कहां रह गया चैन व सुकून
यंत्रो ने गांव का छीन लिया सुकून

बाजारवाद के इस मायाजाल में
जंजार ही जंजार बना दिया गांव को

आजकल सभी फसेबूकीयां कीड़ा हो गए
गांव में अब न अमन रहा न नींद व करार

वृद्धों का हुआ है हालत बेहाल
बच्चों को न मिलता टिवटर से फुर्सत

नानी व नानी की बातें अब कौन पूछता है
अब सिर्फ youtabe का जमाना है भाई

आधुनिकरण के संसाधन में गांव हुआ समाप्त
कहें ‘प्रेम’ कविराय कैसा होगा कल का भारत।

प्रेम प्रकाश

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प्रेम प्रकाश

प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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