समय का फेल बदलता है
जो सोचता हूं शायद वो
मुमकिन नही इस जहां में
कोशिशों का सिलसिला जारी है

मन का आंसू तो कोई नही देखता
मगर आंखों को ये दर्द सहना पड़ता है
अपनो से जंग कोई नही जीत पाया
इस जहां में दिल को वार खाते देखा

जीवन की कटीली लड़ियां सहना पड़ता है
खुद की बात न पूछे लोग कैसे कैसे जीते हैं
बेखौप जीवन जीता हूं ‘ प्रेम ‘मगर कुछ डर अपनो
का अक्सर होता है बेपरवाह असर करता है
प्रेम प्रकाश
पीएच.डी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय रांची झारखण्ड भारत।

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