स्वप्न शिला पर बैठ यथार्थ का चिंतन करता हूँ
दुःख के फेनिल उदधि का मैं मंथन करता हूँ

जो कुछ पायी निधियाँ बाँट चुका औरों को
बचा शेष जो कालकूट उसका आलिंगन करता हूँ।

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