मुत्तरीब गा तू ऐसा नगमा

मुत्तरीब गा तू ऐसा नगमा

ऐ मुतरिब ग तू ऐसा नगमा 
डोल उठे सारी दुनिया
परकटे परिंदे उडने लगे 
जुड़ जाय  सारी बिखरी कड़ियाँ। 

गा कि फट जाए नक्कारा 
आवाज़ सुने सब “तूती” की 
सोया ईमान मुर्दा ज़मीर 
जाग उठे इंसानों की। … !

गम का कोहरा छंट जाय 
पूरब से लाली छिटक पड़े 
हंसने लगे उजड़े गुलशन 
हर शाख अदा से लचक पड़े। ….

!अबोध!

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