एक पेड़ लगा के देखना
जड़ से मिटा देना चाहते हों

जख्म तो हर रोज देते हों
आओ कभी मेरी छांव में

धना धन काट रहे हों
कभी मेरे लिए आंसू निकलना

तुम तो आतुर हो हमें मिटाने में
कभी मेरी टहनियों में झूला लगा के देखना

मैं तो मरने के लिए सज हमेशा रहता हूं
एक दिन मेरी दर्दों को समझ के देखों

जब मैं विलिप्त हो जाऊंगी तो
न कोई दवा न कोई दूवा काम आएगा

तुम भी ‘प्रेम’ के तरह बन जावों
वर्णा पछताने का समय भी नही दूंगी!

प्रेम प्रकाश

No votes yet.
Please wait...