ये कैसा जाल हैं ?

ये कैसा जाल हैं ?

कहने को तो हम आजाद हुए
मुक्ति मिली हमें गुलामी की बेड़ियो से
और कहते हैं हम कि,
हम आजाद भारत के लाल हैं
पर दिखायी न देता ये कैसा जाल हैं?

हमारे वतन पर मजहब कहर बनकर टूटा
पहले तो हमको दूसरो ने लूटा
अब तो अपनो ने ही पीठ में छूरा घोपा
हमें धोखा देने वाली ये अपनो की ही चाल हैं
पर दिखायी न देता ये कैसा जाल हैं?

आजादी मिली तो हमने सोचा कि
हमारे खेतो में हरा धान लहराएगा
और हमारा भारत देश,
फिर से सोने की चिड़िया कहलाएगा
पर ऐसा होने न दिया
कुछ लालची दरिन्दो ने
जो कमी रह गयी थी अंग्रेजो से
वो पूरी कर दी इन नेताओं ने
हमें अब भी नही दिखता कि
भेड़िये ने ओढ़ी शेर की खाल हैं
पर दिखायी न देता ये कैसा जाल हैं?

आज मेरे देश में
ईमानदारों की कीमत नहीं,
देशभक्तो की इज्जत नहीं,
नहीं मिलता आज
प्रभु राम की भूमि पर इंसाफ
ड़ेरा डाल बैठे है सत्ता पर घूसखोर सांप
कानून, न्याय और इंसाफ
सिर्फ पूँजीपतियों के घर का माल हैं,
पर दिखायी न देता ये कैसा जाल हैं?

जागो मेरे देशवासियों
भारत माँ  तुम्हे पुकार रही है,
क्या मेरी बातें तुम्हारें अन्दर
कोई चिंगारी नहीं भड़का रही है?
यदि हाँ, तो तोड़ दो
इस अन्याय के साम्राज्य को
और दिखा दो कि हमारी
रगों में दौड़ता खून भी लाल हैं
फिर ना कोई जाल हैं,
फिर ना कोई जाल हैं।।

– विनोद जैन

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This Post Has One Comment

  1. किसी से ने तो सत्य को उकेरा।

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