नेताजी अपने दफ्तर की कुर्सी पर बैठे-बैठे झूला झूल रहें हैं, साथ ही नये घपले की योजना भी बना रहे हैं। मध्यम कद, गेंहुआ रंग, आवश्यकता से अधिक निकली हुई तोंद, फुले हुए गाल, खिचड़ी बाल और मूछे इतनी घनी और बाहर की तरफ निकली हुई की देवासुर संग्राम के दैत्य याद आ जाए। बड़ी ही गम्भीर मुद्रा में घपले की सोच गहरी होती जा रही हैं। पिछले घपले को किये हुये करीब चार महीने बीत चुके हैं। उससे जो राशि प्राप्त हुयी थी, उससे नेताजी ने शहर से थोड़ी दूर करोड़ो की जमीन खरीद ली हैं। इस कारण से उनके घर की तिजौरी में नकद की कमी हो गयी हैं। इसलिए नेताजी का चेहरा काफी उदास हैं। घपले बडी ही सावधानी से किये जाते हैं। क्योंकि यदि भेद खुल जाए तो कुर्सी भी जा सकती हैं। फिर भी कुशल नेता तो वही होता हैं जो भेद खुल जाने पर भी कुटील पैंतरे आजमा कर अपने आप को बचा ले। ऐसा करने में हमारे ये नेताजी बडे ही माहीर हैं।

पिछले घपले को लेकर एक अखबार में आ जाने के कारण जो शोर हुआ था, उसे नेताजी ने अपने पद का गलत उपयोग करके तथा अपना नीच और रौद्र रूप दिखा कर शांत कर दिया हैं। वो हुआ कुछ यूॅं था कि जो दस करोड़ रूपये कि राशि केन्द्र सरकार ने अकाल पीड़ीत क्षेत्र के लिए दी थी उसमें से पाँच करोड़ रूपये खुद नेताजी ने ही हजम कर दिये और ड़कार तक नहीं की। इस बात की भनक एक देशभक्त पत्रकार को लग गयी तो उसने अखबार में नेताजी पर निशाना साध दिया। जब नेताजी को अपनी कुर्सी ड़गमगाते हुए दिखने लगी तो उन्होने साम, दाम, दण्ड़ और भेद नीति को अपनाया। साम और दाम नीति से अखबार का मालिक तो मान गया, अगर नहीं मानता तो नेताजी भला उसका अखबार निकलने देते? खैर वह तो मान गया पर वह पत्रकार नहीं माना तो नेताजी ने उसे पुलिस के जरिये एक झूठे आरोप में फंसा दिया। अब वह देशभक्त पत्रकार जेल में हैं और देशद्रोही नेताजी सभ्य और समाज सेवक का मुखौटा पहनें नये घपले की योजना बना रहे हैं। सोच में ड़ूबे नेताजी का ध्यान उस समय भंग हो जाता हैं जब उस पत्रकार के माता-पिता उनके कक्ष में घुस आते हैं। उन्हे देखकर नेताजी क्रोधित हो जाते हैं, और चिल्लाकर कहते हैं-

नेताजी :- तुम लोगों को अन्दर किसने आने दिया? निकल जाओ अभी यहाँ से।

पिता :-    मंत्रीजी हमें और हमारे बेटे को माफ कर दीजिए, अब वह दुबारा ऐसी

गलती नहीं करेगा।

नेताजी :- मैंने तो उसे पहले ही बहुत समझाया था, पर उस पर तो देशभक्ति का

भूत सवार था। अब तो वह जेल में ही मरेगा।

माता :-    दया कीजिये हम पर वह हमारे जीने का एक ही सहारा हैं।

नेताजी :- पर वह मेरा एक ही दुश्मन हैं जिसने मुझे ललकारा था, अब तो उसे

एैसी मौत मारूॅंगा कि…..

पिता :-    हम आपके पाँव पड़ते हैं मंत्रीजी, उसे माफ कर दीजिये।

नेताजी :- अब तुम लोग चले जाओ मुझे तुम्हारी कोई बात नहीं सुननी हैं।

पिता :-    मंत्रीजी भगवान के लिए उसे छुड़वा दीजिये।

( नेताजी उनकी बातों से गुस्सा और तंग आकर बाहर खड़े सिपाही को बुलाते हैं, और कहते हैं )

नेताजी :- इन दोनो को ले जाकर बाहर सड़क पर फेंक दो, ध्यान रहे दुबारा

अन्दर ना आने पाये।

( सिपाही उन्हे ले जाकर बाहर पटक देते हैं और नेताजी फिर से नये घपले को अंजाम देने की सोच में ड़ूब जाते हैं। तभी बाहर वह औरत अपने पति से पूछती हैं )

माता :-   क्या ये आदमी हमारा नेता हैं? क्या ये समाज-सेवक हैं? क्या ये इस पद

के लायक हैं?

पिता :-   नहीं, ना ही ये इस पद के लायक हैं, ना ही ये समाज सेवक हैं और

ना ही ये इन्सान हैं।

माता :-   तो फिर ये कौन हैं?

पिता :-   दो पैरों वाला भेड़िया।

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