गुजरा हुआ बचपन और माँ… कभी लौट कर नहीं आते। माँ के जाने के बाद बचपन ही नही कही रिश्तें भी वीरान हो गए जिन्हें माँ ने अपने स्नेह से संजोया था। अब न जिंदगी में वो बात रही न ननिहाल, न घर न परिवार। अब पत्नी पूछ कर सब्ज़ी बनाती है, माँ ने कभी नही पूछा, उसे पता होता था क्या खाना है। खाते समय शक्ल देखकर बहुत कुछ समझ जाती थी, सब्ज़ी अच्छी नही है। कभी गुस्सा कर सो जाता था। देर रात दो रोटी में घी और गुड़ डालकर लाती और डांटती भी थी- ”अब नाटक बन्द कर, चुपचाप खा ले।” बेबस दिनों में उसकी मज़बूरियों को बहुत करीब से देखा…. लेकिन उसने मुझे कभी बेबस होने नही दिया। कही से भी जुगाड़ कर, पिताजी की डांट खा कर भी मेरी जेब मे डाल देती थी। दुनिया की सबसे अच्छी कुक थी, पानी की भी सब्ज़ी बना देती थी… उसमे स्वाद था लेकिन आज सोचता हूँ वो सब्ज़ी नही हमारी मज़बूरियों, बेबसी, गरीबी से उपजी कला थी जो सिर्फ मेरी माँ जैसी दुनिया की सबसे बड़ी कलाकर ही बना सकती थी। उसके चेहरे की झुर्रियों में छुपी वेदना, दर्द, बेबसी को उस वक़्त पहचान नही पाने का दर्द आज भी रातों को सोने नही देता, अब माँ की लोरियों के बिना सोना सिख लिया है मेने क्योकि एक डॉक्टर से नींद की दवाई लिखवा दी है। उदयपुर की वो काली सुबह… वर्ष 2009 माह फरवरी। डॉक्टर ने कह दिया था जल्दी हॉस्पिटल जाओ बचना सम्भव नही है। एम्बुलेंस में माँ की निगाह मुझे देख रही थी, बहुत कुछ कहना चाहती थी लेकिन जुबान बन्द हो गयी थी। सबको मालूम पड़ गया था माँ मरने वाली है, मुझे भी…मैं एम्बुलेंस से निकल कर बाहर आ गया था व आगे वाली सीट पर बैठ गया था जहाँ से माँ नही दिख रही थी क्योंकि मैं उसे नही देख सकता था… तड़प कर मरता हुआ। उसकी ख्वाहिश थी, मैं पास रहूं, मुझ में हिम्मत नही बची थी। हॉस्पिटल पहुंचते से पहले माँ जा चुकी थी, जाते जाते भी पिताजी से मेरा ध्यान रखने का कह गयी, यही शब्द वह बोल पायी थी, ईश्वर से लड़कर भी।
अब न माँ न माँ से जुड़े रिश्तें…. कोई मिलते भी है तो अजनबी की तरह। अब दिल मे कोई ख्वाहिश भी नही रही, माँ बहुत कुछ अपने साथ ले गयी….बहुत कुछ नही सबकुछ। अब जिंदगी जीता नही काट रहा हूँ। मेरी माँ केलिए कोई मातृ दिवस नही…माँ केलिए भला एक दिन क्यो??? हर दिन मातृ दिवस के रूप में ही होता है। तन्हा रातों में सोचता हूँ कि मुझे माँ से बहुत बातें करनी थी, बहुत कुछ कहना था…. दिल के अरमां दिल मे रह गए। गलती मेरी थी, समझ नही पाया उसकी अहमियत, समझ आयी तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह देवी थी, रूप से भी, स्नेह से भी और परमात्मा की कृपा से नाम से भी…देवीबाई। काश माँ होती तो दूर जहाँ धरती और आसमाँ का मिलन होता है, वहाँ तक पैदल चलता उसके साथ, दिल की सारी बातें उससे कर देता और थक जाता तो उसकी गोद मे सर रखकर सो जाता, गहरी शुकन भरी नींद….. जो अब सिर्फ कयामत के दिन आएगी।
मेरी माँ का नालायक बेटा
धनराज माली

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