माँ 
“पराये घर” में हूं मैं ,
या”पराये घर “जाना है,
सच-सच बोलो ना !
माँ मैं तो बिखरी हूँ
तेरे घर के कोने-कोने में ,
कैसे सिमटूंगी 
ऐसे पल छिन में,
मुझे विदा कर भी दो
तो क्या
अहसासों को कर पाओगी ?
एक झटके में पराया
कैसे कर पाओगी ?
माँ सच-सच बोलो ना !
‘तेरा घर पराया’ जानकर भी
प्यार से कोना-कोना सींचा
ये घर में टँगी पेंटिंग के
कोने में लिखा मेरा नाम !
गुलदस्ते में करीने से सजे फूलों में
मेरी छुअन !
मेरी पसंद के रंग से सजी
घर की दीवालें ,
चटख रंग के दरवाजे !
बालकनी में महकते
मेरे लगाये फूल-पौधे !
दरवाजे में बँधा ,
मेरा बनाया बँदनवार !
मेरी पसंद के पर्दे
बेडशीट ,खिलौने !
सब कर पाओगी दूर
मेरे साथ-साथ !
शायद हर दिन फुदकेंगी
ये गिलहरियाँ
मेरे बाद भी !
शायद छतों पर यूं ही
उतरा करेंग,
पंछियों की कतारें ,
ज्यों चहकते है मेरे साथ,
शायद ! बिल्कुल ऐसे ही !
शायद ! यूं ही 
होते रहेंगे गुलजार
ये मेरे लगाये घोंसले,
क्या इनके शोर में ,
मेरी यादों का शोर,
दवा पाओगी?
माँ ! सच-सच बोलो ना !
धर के कोने-कोने में
बिखरी हूं “मैं”
और मुझे याद करने की
सौ वजहें ,
इक पल में मुझे समेटकर
दूर कैसे कर पाओगी ?
दसकों की यादें,
यूं पल में भुला पाओगी?
.माँ 
मुझे तुम्हारे घर से विदा
कैसे कर पाओगी ?
माँ सच-सच बोलो ना !

–  मीनाक्षी वशिष्ठ

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