अल्फाज

अल्फाज

तेरी बातों में नहीं है अब वो नशा,
जब तू मिला था मुझसे पहली दफा।।

कहाँ गये तेरे अल्फाज अब
जो हुआ करते थे सिर्फ मेरे
लिए बेवक्त-बेवजह।।

मैं पूछना चाहती हूँ तुझसे
तो क्या था वो सब झूठ या फरेब??
या फिर सिर्फ एक दिखावा।।

जब तुझे भी यही करना था
आज के लोगों की ही तरह
तो क्याें आया तू मेरी ज़िंदगी में बेवजह।।

खैर छोड़ तूने जो कुछ भी किया बहुत अच्छा किया,
करती हूँ मैं तेरा दिल से शुक्रिया।।

मैंने तुझसे सच्ची इबादत है किया, तू माने या ना मैंने
लेकिन फिर भी मैंने अपने प्यार का रंग तुझपे जरूर है दिया।।

श्वेता पाण्डेय

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This Post Has 2 Comments

  1. Waah! Shweta, hogyi tum to

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  2. शुक्रिया डियर प्रगति

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