ग़ज़ल

ग़ज़ल

फ़ोन पर ज़ाहिर फ़साने हो गए
ख़त पढ़े कितने ज़माने हो गए

ऐब इक पाला फ़क़त हमने मियां
चार सू अपने ठिकाने हो गए

बेटियां कोठों की ज़ीनत बन गईं
किस क़दर ऊँचे घराने हो गए

इश्क सोचे समझे बिन कर तो लिया
नाज़ अब मुश्किल उठाने हो गए

जानते कमज़ोरियां माँ बाप की
आज के बच्चे सयाने हो गए

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