यादों को जिंदा रखने को मिलते रहो साथी
धुंधली तस्वीरों में सूरते नज़र में नहीं आती

जो रूकावटे ना हों बीच में धारा नहीं मचले
पथरीली राहें तो मिलनी हैं कैसे कोई बच ले

उथल पुथल ना हो तो किस काम का जीवन
वीरानों में लगता नहीं है इंसा का कभी मन

वक्त का है क्या भरोसा बदल ले अपनी चाल
गैर बन कैसे कहोगे फिर अपने दिल का हाल

बदले जो ना उसूल कहाँ मिलते हैं ऐसे लोग
कुदरती रज़ा से बनते है मुहब्बतों के संयोग

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