ख़शनुमा सफर

जिन्दगी का सफर, कुछ यूँ हुआ मयस्सर,
गुज़रते लम्हें, कुछ यूँ हुए मुख्तसर ।
ख्वाहिशों का था लम्बा सफर
थोड़ी मुश्किल थी वो अन्जानी डगर,
लेकिन, मां की दुआओं का था असर
खुशनुमा सा हुआ वो अनजाना सफर,
करीब हूँ मंज़िल के और सुहाना लगता हर मंजर,
यूँ ही दुआ देती रहें मां, तो
यक़ीनन मेरे भी हौसलों की जल्द होगी सहर
ज़िन्दगी का सफर, कुछ यूँ हुआ मयस्सर।।

नग़मा सिद्दीकी ”नग़मा“

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