मैं कल्पना हूँ ,

कल्पना के उन्मुक्त शिखरों को

छूना चाहती हूँ ।

डूबना चाहती हूँ ,

अनन्त गहराइयों में ।

एक नये संसार का सृजन भी

करना चाहती हूँ ।

कितना सुंदर है कल्पना का संसार ।

पर जानती हूँ ,

कल्पना की सीमाओं को

यह जीवन कल्पना से परे ,

कुछ भी नहीं ।

जानती हूँ , कल्पना की वर्जनाओं को ।

फिर भी , कल्पना हूँ ।

कल्पना को साकार करना चाहती हूँ ।

कल्पना मिश्रा

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2 Comments

  1. विनोद कुमार मिश्र

    मन प्रफ्फुलित हो जाता है,
    सृजन की इच्छा बलवती हो जाती है,
    कल्पनाओं डोर थामे, उड़ चलूँ नभ में,
    सोई विधा फिर जाग जाती है।

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  2. Kalpana Misra

    प्रतिक्रिया में आपकी रचना पढ़ कर मन आनंदित
    हो गया। बहुत आभार एवं धन्यवाद ।

    Rating: 3.7/5. From 3 votes. Show votes.
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