दुपहरी और श्रमिक

दुपहरी और श्रमिक

तपती धूप पसीने टपके ||
जो श्रम करने को आदी है ||
पेट के खातिर ही तो करते ||
ये पक्के श्रमिक दिहाती है ||

धूप छाँव बर्दाश्त ये करते ||
सहते आंधी और बरसात है ||
तब जा के इनके घर आता ||
कुछ सस्ते सरल सामान है ||
इन्ही के घर आफत भी आती ||
पिछवारे खड़ी हो उधिरातो है ||
पेट के खातिर ही तो करते ||
ये पक्के श्रमिक दिहाती है ||

सड़ जाते है कपडे इनके भी ||
लथपथ हुये पसीनो में ||
दर्द इन्हे भी होता रहता है ||
ये छुपा के रखते सीनो में ||
औकात ये अपनी नहीं भूलते ||
काम करते दिन राती है ||
पेट के खातिर ही तो करते ||
ये पक्के श्रमिक दिहाती है ||

इन्ही के बच्चे पढ़ नहीं पाते ||
इन्ही को घेरे असुविधा है ||
एक बार सर्वे कर के देखो ||
बड़ो के घर सब सुविधा है ||
ख्याल कोई नहीं इनका करता ||
ये बात नहीं फरमाती है ||
पेट के खातिर ही तो करते ||
ये पक्के श्रमिक दिहाती है ||

शम्भू नाथ कैलाशी

Rating: 5.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

शम्भनाथ

पिता का नाम स्वर्गीय श्री बाबूलाल गाँव कलापुर रानीगंज कैथौला प्रतापगढ़ उत्तर-प्रदेश जन्म ०७/०८/१९७४ शिक्षा परानास्तक पुस्तकालय विज्ञानं पेसा नौकरी

Leave a Reply

Close Menu