दिन पहले मै घर आया और अपने मित्र से मिलने निकल पड़ा। पता चला कि उसके घर के सामने तीन-चार दिन से पुलिस चक्कर लगा रही थी। उसने बताया कि पति-पत्नी अहमदाबाद में दिहाड़ी मजदूरी करते और जैसे-तैसे कर रोज़ अपना पेट पालते। एक दिन पत्नी जब स्टोव पर खाना बना रही थी तभी अचानक आग लग गयी और पति-पत्नी जल गये जिसमे पत्नी की मृत्यु हो गयी और पति को अस्पताल भर्ती करवाया गया। पत्नी के शव को घर लाया गया। शव को जैसे ही घर पर रखा गया वैसे ही उसके माता-पिता आ पहुँचे और घरवालों से मुआवजे की मांग करने लगे। माता-पिता को इतनी भी शर्म नही आयी कि उनकी बेटी की मृत्यु हुई है आँगन में उसका शव पड़ा हुआ है और वह पैसो की मांग कर रहे है। फिर घर वालों ने समझा-बुझा कर साढ़े-तीन लाख रुपयो में मामला रफादफा किया और बिना दाह-संस्कार के ही चल दिए।
ना पल भर के लिए अश्क बहे ना कोई बात याद आयी, बस! मुँह उठा कर चल दिये। इस तरह संसार में इंसानियत ही मर गयी। समाज और गांव की भी क्या छोड़े? शव तीन दिन तक आँगन में पड़ा रहा और दाह-संस्कार की भीख मांगता रहा पर किसी के कान में जूं तक न रेंगी। शव ले जाने के लिए चार कंधे ना सही पर कोई जीप या टेक्टर भी शव के दाह संस्कार के लिए नही दे सका। मर कर भी एक शव दाह-संस्कार की विनती करता रहा और दाह-संस्कार के साथ एक सुकून भरी मौत भी न पा सका। अंत में एक अच्छा-भला पुलिस वाला अपने घर से जीप लाया और तब दाह-संस्कार का अंतिम पड़ाव पार हो सका।

इंसानियत खत्म हुई जहाँ से
लाश से भी पैसे लेते यहाँ से,
ज़िंदगी शिकायत करती कि
सुकून की मौत मिले कहाँ से।

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