“तू यहाॅ खड़ी है?” पीछे से एक हाथ उसके कन्धे पर पड़़ा। समीक्षा चैंककर अपने ख्यालों से बाहर आयी और पीछे देखा। हल्के भूरे रंग के ब्लंट-कट बालों को उंगलियों की कंघी से ठीक करती नेहा उसके पीछे खड़ी है। समीक्षा की ही तरह पाॅच फीट-चार इंच लम्बी, और छरहरी। बस इसका रंग समीक्षा की तरह दूधिया ना होकर गेंरूआ है।
“तू कहाॅ रह गयी थी?” समीक्षा ने पूछा
“सहेलियों को आखिरी बाॅय कर रही थी।” इम्तेहान का एडमिट-कार्ड देखते हुए उसने ठण्डी आह भरी। “अब तो काॅलेज में ही मिल पायेगें। वो भी अग़र ये बारहवीं के एक्जाॅम पास-आड़ॅट कर लें।”
“क्यों-? एक्ज़ाम देने नहीं जायेगी क्या?” एक तर्कपूर्ण बात कहकर समीक्षा नेकदम बरामदे से बाहर रख दिया।
नेहा कुछ ज्यादा ही जताती है अपने जज़्बातों को। सारी लड़कियों वाली आदतें हैं उसकी। जरूरत से ज्यादा बोलना-, जरूरत से ज्यादा हॅसना और हर छोटी बात पर रोने लगना, मग़रसमीक्षा, नेहा की तरह छोटे या कमज़ोर दिल की नहीं है। वह जानती है कि मसूरी जैसे छोटे से षहर में उसे उसके दोस्त फिर कहीं ना कहीं मिल ही जायेगें, और ख़ासतौर पर तब-जबकि डिग्री काॅलेज भी गिनकर दो ही हों।
नेहा को तो अब जाकर उसका तर्क समझ आया है। उसने भी तुरन्त समीक्षा के पीछे चल देने को कदम उठा लिया और ठिठकी। “बारिष में ही जायेगें क्या?” उसने चिल्लाकर पूछा
“तेरी नायर के पास ना गये होते, तो पहले निकल सकते थे।” समीक्षा चल दी, बारिष के पानी से सराबोर आॅगन में बडे़-बडे़ डग भरती हुई।
नेहा ने अनमने से छत की सीमा पार की और उसके पीछे चल दी।
“थोड़ा धीरे चल न!” बार-बार चेहरे सेबालों को हटाती हुई, नेहा उसके पीछे-पीछे स्कूल के गेट तक आ गयी।“वैसे नायर ने कोषिष तो की ही थी? अब तुझे हिप्नोटाईज करना भी तो मुष्किल है ना?”
समीक्षा एक पल को थमी।
पलटकर घूरते हुए। “अब ये भी मेरी ही गलती है?” उसने दोबारा अपनी राह ली। “मैंने तो पहले ही कह दिया था कि मुझे तेरी मिसेज नायर के पास नहीं जाना। उसे कुछ आता-जाता तो है नहीं। पूरे स्कूल मेंकोई गम्भीरता से लेता है उसे? साॅईको पढ़ा पढ़ाकर वह खुद साईको हो गयी है…और अग़र तू भी उसके जैसी नहीं होना चाहती, तो उसकी क्लाॅस अटेन्ड करना छोड़ दे।” एक ही साॅस मेंकाफी कुछ बक दिया उसने।
सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे खड़ी होकरदोनों बस का इन्तजार करने लगी। इस पेड़ की छाॅव में कई सारे लोग बारिष से बचने के लिए जमा हैं।वैसे ये पेड़कोई बस स्टाॅप नहीं है, मग़र बसें यहाॅ से गुजरते हुए ठहरती जरूर हैं।

समीक्षा इस आर्मी स्कूल से पहले, मसूरी के नामचीन इग्ंिलष मीड़ीयम हाॅस्टेल मेंपढ़ रही थी, और वहीं का असर है कि इस आर्मी स्कूल के अनुषासन के खिलाफ उसकी जेब में हमेषा च्विगंम मिलता है। स्कूल से बाहर आते ही उसकेजबडे़ जुगाली करने लगते हैं। उसकेअन्दाज़, उसका रवैया, उसका आत्मविष्वास, इस आर्मी स्कूल की हर लड़की से अलग है-,और अलग चीजें तो लुभाती हीं हैं। षायद इसीलिए आस-पास से गुजरता स्कूल का हर दूसरा लड़का उसे ताकते हुए निकलता है। उसकेचेहरे में-, व्यक्तित्व में एक खिंचाव है, ख़ासकर उसकी आॅखोंमें। अग़र कोई नज़रइनसे रू-ब-रू हो जाये, तो कुछ पल ठहर ही जाती है। दिल का सब कुछ उगल देने को तैयार हो जातीं हैं।
मग़रसमीक्षा की आॅखें इनमें से किसी के चेहरे पर नहीं रूकतीं। ये नासमझ-बेलगाम-बेअदब-बचकाने से बच्चे दिखायी देते हैं उसे। जैेसे उसकी अपनी उम्र और सोच इन सब से परिपक्व हो। वह बस बर्दाष्त कर रही है उन्हें, और उनके बेतुके फिकरों को, और उनकी जलील सी नज़रों को। जबडों के बीच भींच-भींचकर च्विगंमचबाते हुए, बस अन्दर ही अन्दर दुआ कर रही है कि उसे यहाॅ ज्यादा देर रूकना ना पड़े। और उसकी दुआ सुन ली गयी। सामने से दो बस आ रहीं हैं।
लाईब्रेरी रोड जाती हुई एक बस को उसने हाथ दिया।
सीट पर बैठते ही नेहा ने फिर कुछ सोचकर बात छेडी। “समी वह तेरी मदद कर रही थी।”
समीक्षा ने बैग कन्धे से उताकर गोद में लिया। “वह मेरी मदद नहीं कर रही थी, वह प्रेक्टिस कर रही थी मुझ पर।”
“लेकिन तेरी भी तो गलती है न? तूने उसे आकाष और सुधा के बारे में ठीक से कुछ बताया ही नहीं।”
“क्या बताती?” उसने त्यौंरंी चढाकर नेहा को देखा। “सिर्फ दो-चार बातें सुनकर बौखला गयी थी तेरी नायर, अग़र बचपन की हिस्ट्री सुन लेती तो इस वक्त पागलखाने की एम्बुलेस ले जा रही होती उसे।”
नेहा उसकी बात से सहमत है, वाकई ऐसा हो सकता था। वह तो कल्पना तक कर सकती है उस सफेद एम्बुलेन्स की-और अस्पताल की वर्दी पहने दो वार्डबाॅय की जो उसकी चीखतीं-चिल्लाती नायर मैम को जबरदस्ती खींचकर एम्बुलेन्स तक ले जा रहे हैं।
बुरा ख्याल है! उसने सिर झटका, और समीक्षा की ओर देखकर। “चल छोड़ उसे। मुझे भी बता ना कि कल रात क्या देखा था तूने?”
बस की खिड़की से बाहर च्विगंमथूक कर। “आकाश और सुधा का एक्सीडेन्ट।”
“ओह! नाॅट अगेन। ये सपना तोमैं भी तीन बार सुन चुकी हूॅ।” उसने बोरियत के तौर पर आॅखें घुमायीं। “तो इस बार मर गये कि जिन्दा हैं? वैसे, मर ही गये हों तो अच्छा है, तेरे सपनों में तो आना बन्द होगा उनका।”

हजार नाराज़गियों के बादजूद समीक्षा, नेहा से कुछ छुपा नहीं सकती। किषोरावस्था में दोस्ती सघन होने में वक्त नहीं लेती। सिर्फ दो साल पहले हुई इनकी दोस्ती भी इतनी गहरा गयी है कि दोनों के बीच कोई पर्दा नहीं रहता। जब तक एक-दूजे से बता ना दें, तब जक जैसे ज़िन्दगी में पूरी तरह कुछ घटता ही नहीं। इसीलिए एक राज़ जो समीक्षा का परिवार तक नहीं जानता, वह नेहा जानती है।
“तेरे ये सपने कितने लाॅजिकल होते हैं न? मेरे सपने तो मुझे याद तक नहीं रहते, और याद रहें भी, तो कोई सिर पैर नहीं होता उनका।” नेहा ने अपनी ही खिल्ली सी उडायी, और फिर जल्द ही संजीदा भी हो गयी। “वैसे तूने तो कहा था कि अब वह नहीं आते सपने में?”
“हाॅ-, इस बार भी करीब तीन महीने बाद ही दिखें हैं।”
समीक्षा ने सहज की कह दिया।
नेहा अवाक् है उसकेअन्दाज़ पर। “तू इतनी कूल कैसे रह सकती है इस हालत में? तुझे अजीब नहीं लगता ये सब?”
समीक्षा की आॅखें खिड़की से बाहर ही हैं। “बचपन मेंमिले लोगों को सपनों में देखना,इस में अजीब क्या है?”
बस ने लाईब्रेरी रोड पर ब्रेक लगा दिये। बस में बैठे आधे लोगों की तरह समीक्षा और नेहा का स्टाॅप भी यही है। यहाॅ से उतरकर कुछ दो किलोमीटर पैदल चलना होगा, घर पहुॅचने के लिए।
समीक्षा और नेहा उतर गयी।
बारिष की बारीक बूॅदों से बचने के लिए दोनों के चेहरे सड़क पर झुके हुए हैं। “तो तेरी मम्मी को क्यों याद नही रहे वह दोनों?” नेहा ने सवाल किया
समीक्षा का झुका हुआ सिर ना में हिला। “जिन्हें अपनी बेटी का जन्मदिन ही याद नही रहता, उन्हें लोग क्या याद रहेगें?” समीक्षा ने नज़रें अपनी सीध में कर के कुछ सोचा। “वैसे भी पापा के हर ट्राॅन्सफर के साथ, हमारा घर और पड़़ोस बदलता रहता था। आकाष का षरीर फौजियों जैसा है।”नेहा की ओर देखकर-“हो सकता है वह पापा के बटालियन के हों, जिनके साथ हम ज्यादा वक्त नहीं रहे।”
“हमम।” नेहा ने निचला होठ दाॅतों के बीच दबाये गम्भीरता से सोचा। “फिर भी एक बार खुल कर बात तो कर दोनों से-, षायद उन्हें कुछ याद आ जाये?”
“उन्हें याद दिलाने की जरूरत ही क्या है?”समीक्षा ने कन्धे उचका लिये। “उनके पास वक्त कहाॅ है मेरी बातें सुनने का? कुछ बता भी दूॅ, तो उन्हें बस एक और वज़ह मिल जायेगी आपस में झगडने के लिए।” उसका सिर फिर झुक गया
“तू उनकी बेटी है समी, उन्हें वक्त निकालना होगा तेरे लिए। वह तुझे इस तरह अकेला नहींछोड़ सकते।”

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