शिवा और भिवा आज बड़े प्रसन्न थे। शाम को खेत से आते वक्त उन्हें कल होने वाले उत्सव की भनक मिल गई थी। नऐ झंड़े, पताके, तोरणों से पाटीलवाड़े का हर घर ज़गमगा रहा था। हर तरफ प्रसन्नता का वातावरण था। गाँव के मध्य स्थित मारुती का मंदिर दमक रहा था। गाँव का पूज्यनीय पिपल का वृक्ष भी अपनी नई पत्तीयों के साथ पूरी तरह तैयार था। आखीर यहीं पर कल गाँव का मुख्य पोला उत्सव मनाया जाना था। पाटीलवाड़े के कई बैल आज खेत नहीं गऐ थे, जो गऐ थे वो जल्दी वापिस आ गऐ थे। कल के उत्सव के लिऐ बैलों को आज ही से तैयार किया जा रहा था। उन्हें नहलाया जा रहा था, तेल से मालिश हो रहीं थी. सिंघो को रंगा जा रहा था। इन्हीं दृश्यों को देखते हूऐ धनी के दोनों बैल शिवा और भिवा बड़े आनंद और उत्साह के साथ अपने मालिक के आगे-आगे बढ़े जा रहें थे। उन्हें अपने साथ भी ऐसे ही व्यवहार की आशा थी।

पाटीलवाड़ा पार करके शिवा और भिवा जैसे ही अपने क्षेत्र खातटोली में आऐ यहाँ की परिस्थीती भिन्न थी। ना कोई तोरण, ना पताका, ना साज़सज्जा, ना आनंद। कुछ बैल अभी तक खेतों से ना लौटे थे, जो लौटे थे वो भी दिनभर की थकान से चुर थे। पाटीलवाड़े और खातटोली के बैलों के बीच वोहीं अंतर था जो इंसानों के बीच था अमीरी और गरिबी का..। खातटोली गाँव के गरीब किसानों की बस्ती थी। जो कल के पोले की तैयारीयाँ नहीं पर ईश्वर से बारिश के लिऐ प्रार्थना कर रहें थे जो पिछले सात दिनों से लापता थी।

गाँव के अन्य किसानों की तरह धनी भी पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था। शुरुआत में अच्छी बारिश के बाद किसानों के चेहरे खिल उठे थे, वे जोर-शोर से खेती के कामों में लग गऐ थे। चाँदोराव जो गाँव के ज्योतिष थे और कथित तौरपर बड़े ज्ञानी पुरुष थे। उन्होंने भी अच्छी बारिश की भविष्यवाणी की थी। उनका पाला हुआ मेंढक इस बार पानी से भरॆ हुऐ कटोरें में कुदा था जो स्पष्ट रुप से अच्छी बारिश का लक्षण था। ईन दैविय चिन्हों से गाँव के किसान और ही जोश में थे, ईस बार वे सारा कर्ज चुकाने की कोशिश में थे। पिछले वर्ष के अकाल के घाव अब भी हरें थे जो किसानों को कर्ज के रुप में दर्द दे रहें थे। पर सच्चा किसान वो होता है जो दर्द के साथ जीना सीख लें। इस बार फिर किसान अपनी सारी जमा पूंजी, पिता के खेत, पत्नी के गहनें और बच्चों का भविष्य गिऱवी रखकर बीज़ बोने को तैयार था। अपनी सारी संपत्ती मिट्टी में दबाने की हिम्मत मिट्टी के लाल ही कर सकते है। एक बार फिर किसानों की सारी आशा उपर आकाश और नीचें धरती पर टिकी थी। जो सात दिनों के सुखे से थोड़ी धुमिल हो गई थी। खेत में बीजों ने पौधो का रुप ले लिया था पर किसानों की आशाओं को अंकुरित होने के लिये अब भी वर्षा की आवश्यकता थी।

शिवा और भिवा गाँव के दो सबसे उम्दा बैल थे जो धनी की पत्नी शांता के कंगणो से खरीदे गऐ थे। शिवा और भिवा बैल नहीं धनी के दो हाथ थे। इन्हीं के दम पर धनी अपने खेतों को सबसे पहले तैयार कर लिया था। पाटील के ट्रॅक्टरों से ज्यादा तेज़ और ताकतवर थे दोनों। इसीलिये इस बार पाटील ने धनी को अपने दोनों बैल गिरवी रखने को कहा था, पर धनी के लिये दोनों बैल पत्नी के मंगलसुत्र से ज्यादा किमती थे।

बैलों के प्रती अपनी कृतज्ञता दिखाने का पर्व पोला होने के कारण शिवा और भिवा को आज कुछ विशेष व्यवहार, भोजन की आशा थी, पर जिन किसानों की फसल सुखने के कगार पर हो वे क्या त्योहार मनाऐंगे। हाँ पाटीलवाड़े में जोर-शोर से पोला मनाया गया। ढोल-ताशों के साथ बैलों को घुमाया गया, उन्हें विशेष वस्त्रों से, आभुषणों से सजाया गया, पुजा गया। उन आलसी, कामचोर बैलो की ऐसी शोभा देखकर शिवा और भिवा मन मसोसकर रह गऐ और बड़ी करुण दृष्टि से धनी को देखने लगे। धनी ने पास जाकर दोनों को गले से लगा लिया और रोने लगा.. जैसे वो उन से क्षमा माँग रहा हो। शिवा और भिवा भी अपने मालिक की इस दशा पर दुखी थे, वे उसे चाटकर,सहलाकर कहना चाह रहे हो, चिंता मत करो हम है। देखते- देखते सात दिन और बीत गऐ। बारिश अब भी लापता थी। चाँदोराव भी गाँव से गायब थे। खेत में छोटे पौधो के साथ किसानों की आशाऐ भी मुर्झा रहीं थी। वहीं पाटीलों के खेत लबालब थे, उनके कुऐं अब भी पानी उगल रहें थे।

धनी रोज़ सुबह अपने खेत जाता और अपनी आशा की तरह सुखते जा रहें एक बेर के पेड़ तले बैठकर उन मुर्झाते हुऐ पौधो को देखकर बारिश के लिये ईश्वर से प्रार्थना करता। वहीं पास में बँधे हुए शिवा और भिवा के लिये भी अब खेत में कोई काम बाकी नहीं था। सारे काम बारिश ने रोक रखे थे, अगले तीन दिन महत्त्वपुर्ण थे। बारिश की सख्त ज़रुरत थी।

दोपहर में तहसील से एक आदमी आया और सब किसानों को पंचायत के आँगन में बुलाया गया। ये मोहन बाबु थे जो ग्राम विकास अधिकारी थे। खेतों में तो कुछ काम था नहीं, सारे किसान शाम को पंचायत के सामने ईकठ्ठा हो गऐ। ऐसी सभा ऱोज़- ऱोज़ थोड़े ही होती थी, सो उत्सुकतावश गाँव की महिलाऐं भी वहाँ जमा थी। सुखू की पत्नी तुलसाबाई को वहाँ बुलाने का कारण भी सब स्त्रियाँ जानना चाहती थी। पंचायत के चबुतरे पर गाँव के सरपंच संभाजीराव पाटील, मोहन बाबु के साथ विराजमान थे। सभा शुरु हुई, मोहन बाबु ने बताया की पिछले वर्ष कर्ज, अकाल और फसल की बरबादी से तंग आकर आत्महत्या करनेवाले किसान सखाराम की पत्नी तुलसाबाई को दो लाख की सहायता राशी प्रदान की जा रही है। साथ ही उसका सारा कर्ज भी माफ कर दिया गया है। मोहन बाबु ने एक कागज़ का टुकड़ा (चेक) तुलसाबाई को दिया, इस क्षण को कैमरे में कैद किया गया।सरकारी रिकॉर्ड के लिये कुछ कागज़ी रस्में हुई और सभा विसर्जीत हुई।

मोहन बाबु को अकेला पाकर गाँव के किसानो ने (जिनमें धनी भी शामिल था) अपनी व्यथा सुनाई, कहा “ बाबुजी इस बार भी तो सुखे जैसे ही आसार है, सरकार की कुछ योज़ना है ॽ” मोहन बाबु ने बेफिक्री के अंदाज़ में कहा “ पहले सुखा तो पड़ जाने दो.. सरकार एक बार सुखा घोषित कर दे, तो हम योजना भी बना लेंगे…” और हँसते हुए पाटीलवाड़े में विराजमान गणपती के दर्शन करने चले गए। इधर तुलसा उस चेक को उसी प्रकार देख रहीं थी जैसे अनपढ़ व्यक्ती किताबों को…। घनी भी निराश मन से आसमान की तरफ़ देखता हुआ घर वापिस आया। बैलो को बाँधकर वो बाहर ही लेटा रहा। बार-बार वो ही दो शब्द उसके कानों में गुँज़ रहें थे “सहायता राशी”..। आज भी वर्षा नहीं हुई थी। खातटोली में सन्नाटा छाया था.. पाटीलवाड़े से गणेश आरती की आवाज़ आ रही थी…

अगली सुबह धनी जल्दी ही खेत में जाने को तैयार हो गया। वो अपनी बेटी लक्ष्मी को बहोत देर तक देखता रहा। उसके सिर पर हाथ रखकर माथे को चुमा। उससे कुछ कहना चाहता था पर कह ना सका। पत्नी को एक क्षण देखने के बाद वो चल पड़ा। आज एक नई चीज़ उसके साथ खेत में जा रही थी, वो थी एक मोटी रस्सी.. शिवा और भिवा भी उस रस्सी को हैरानी से देख रहे थे।

खेत पहुँचकर धनी ने दोनो बैलो को बाँध दिया। खेत का एक चक्कर लगाने के बाद उसकी बची-कुची आशा भी जाती रहीं। वो पौधे भी धनी के मुख की तरह पीले पड़ गऐ थे। धनी दिनभर उसी बुढ़े पेड़ तले लेटा रहा। आसमान साफ था पर धनी के दिमाग में विचारों के बादल घुमड़ रहें थे। वो कर्जमाफी के बारे में सोच रहा था, उन दो लाख रुपयों के बारे में सोच रहा था, वो सहायता राशी के बारे में सोच रहा था। पर ये सहायता राशी केवल आत्महत्या करने के बाद ही मिल सकती थी। कर्ज से मुक्ती हर किसान का स्वप्न होता है। पर धनी का ये स्वप्न उसके जीवित रहते पुरा होने वाला नही था, इसके लिये धनी को मरना था, आत्महत्या करना था। सुबह घर से लाई उस नई चीज़ का काम अब पड़ने वाला था। एक और किसान सहायता राशी के लिये स्वंय को बलि चढ़ा रहा था।

धनी ने खेत की मिट्टी उठा कर माथे को लगाई। जो खेत वर्षा की करोड़ो बुँदो के लिये तरस रहे थे, वे ही खेत शायद धनी के दो बुँद आँसुओं से तृप्त हो गऐ थे। धनी ने अपने दोनो बैलो को गले लगाया। इस असमय प्रेम का कारण शिवा और भिवा समझ नही पाऐ। शाम होने ही वाली थी, खेतों से वापिस जाते किसानों की नज़रों से बचकर धनी को ये काम करना था। धनी उस कमजोर, बुढ़े पेड़ पर चढकर एक मजबुत टहनी ढुँढने लगा। वहाँ उसने रस्सी बाँधी, फंदा बनाया और फाँसी पर झुलने को चला। तभी उसकी नज़र शिवा और भिवा पर पड़ी जो अपने खुँटे से बंधे हुऐ बड़ी उत्सुकता से धनी के इस कृत्य को देख रहे थे। धनी ने कुछ सोचकर उन दोनों को खोल दिया, जैसे अपनी मुक्ती से पहले वह इन दोनो को मुक्त करवाना चाहता हो।

धनी गले में फंदा डालकर जैसे ही नीचे कुदा शिवा और भिवा को सखाराम की याद आई। ईन दोनो ने एक वर्ष पहले सखाराम को ऐसी ही अवस्था में देखा था, फिर वो पुरा घटनाक्रम उन दोनो की आँखो के सामने घुम गया। ये दोनो बैल अपने मालिक को उस तरह मरते नहीं देख सकते थे। उधर धनी छटपटा रहा था, रस्सी उसके गले में कसती जा रही थी। नीचे दोनो बैल रंभा रहे थे, तेज़ी से इधर-उधर दौड़ रहे थे। भिवा जाकर अपने मालिक के हिलते हुऐ पाँवो को सुँघने लगा, चाटने लगा। इतने में एक जोर की आवाज़ और झटके ने धनी और भिवा दोनो का ध्यान अपनी और खींचा…। शिवा अपनी पुरी ताकत से उस बुढ़े पेड़ से टकरा रहा था… वो थोड़ी दुर पीछे हटता फिर तेज़ी से दौड़ता हुआ उस पेड़ को टक्कर मारता। धनी इस दृश्य को देखकर हैरान रह गया। पर गले के फंदे ने अब अपना असर दिखाना शुरु कर दिया था, धनी की आँखो के आगे अंधेरा छा रहा था। पर अब वो ईश्वर से अपने लिये थोड़ा और समय माँग रहा था. क्योकि दो जानवर एक इंसान की जान बचाने के लिये मेहनत कर रहे थे।

शिवा के इस काम में अब भिवा भी जुड़ गया था। वे दोनो बारी-बारी से उस पेड़ पर निर्मम प्रहार कर रहे थे। इन दो बैलो की समझदारी और सुझबुझ किसी भी इंसान को शर्मिंदा करने के लिये काफी थी। आखीर इन दो वफ़ादार बैलों के हिम्मत, हौसले और ताकत के आगे वो बुढ़ा पेड़ टिक नही पाया। पेड़ के धराशायी होते ही धनी के पाँवो तले ज़मीन आई, अब वो अपने पैरों पर खड़ था और बेहोश सी अवस्था में अपने दोनो बैलो को देख रहा था, जो उसके पाँवो को सुँघ रहे थे, चाट रहे थे। नियती ने धनी को एक और अवसर दिया था.. उसने भी अब मुश्किलो का सामना हिम्मत से करने की ठान ली थी। धनी जब उन बैलो को लेकर घर की और चला तो प्रकृति उसे पहले से ज्यादा सुंदर दिखाई दे रही थी। रास्ते में उसे चाँदोराव गाँव में आते दिखाई दिऐ। आकाश में हल्की सी हलचल हो रही थी।

आधी रात शिवा और भिवा के रंभाने और चिल्लाने की आवाज़ सुनकर धनी घबराकर घर से बाहर आया। वहाँ आँगन में उसके दोनो वफादार बैल मुसलाधार बारिश में भीग रहे थे। धनी धीमें-धीमें कदमों से उनके पास गया, बड़ी कृतज्ञ और कातर नज़रों से उन्हें देखने लगा। उनको गले लगाकर रोने लगा। सारी रात मुसलाधार बारिश होती रहीं।

बड़ी भोर को ही धनी, शांता और बेटी को लेकर खेत में आया। कल रात की बारिश ने खेतों को फिर जीवित कर दिया था, अब खेतों में बहुत काम था। शांता ने खेत में आते ही उस झुके हुऐ पेड़ की तरफ देखकर पुछा “ये पेड़ कैसे झुक गया ॽ”। धनी ने शिवा और भिवा की और देखते हुऐ मुस्कुराकर जवाब दिया “वफादारी की ताकत से…” । शांता असमंजस के भाव से धनी की और देख रही थी, धनी अपने खेतों को देख रहा था। शिवा और भिवा मज़े से घास चर रहें थे। धनी का खेत पानी से लबालब भरा था। ईश्वर की और से सहायता राशी उसके खेतों में आ चुकी थी…..

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