हाय गर्मी ! हाय गर्मी !,
आग लगा रही ये गर्मी ,

सुबह -शाम ,दिन -रात ,
तड़पा रही ज़ालिम गर्मी .

हाल हमारा यह कर डाला ,
इसने बैंगन की तरह भुन डाला ,

रसोई बन जाये भट्टी के जैसी ,
भोजन पकाना मुहाल कर डाला ,

तरस ना खाए यह गर्मी ….
इतनी तो है प्रचंड गर्मी यह ,

उसपर बिजली भी करे मनमानी .
पंखा,कूलर ,फ्रिज औरऐ सी ,

ने भीदेखोहार है मानी .
पसीने में रह-रह का डुबोये यह गर्मी ..

पानी पी पी कर हम आघाये ,
प्यास तो फिर भी ना बुझ पाए ,

हमारे प्राण संकट में डालकर ,
मन ही मन यहमुस्कुराये,

हमारा खून क्रोध मे खौलाए यह गर्मी ..
कोई तो सूरज कोजाकर समझाए,

इतनी गर्मी क्यों वोह खाए,
उसे कहो जा बादल में छुप जाये,

जल्दी से बरखा रानी को भेजो,
बस अब और रास ना आयेयह गर्मी…

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