आह्वाहन

आह्वाहन

कहानियों की तलाष में भटकना लेखक का स्वभाव होता है, मगर हम ऐसी तलाष में इतनी दूर निकल जायें कि वापसी ही ना हो पाये-, ऐसा कौन सोच सकता है?
मैं, अलंकार त्रिवेदी बतौर लेखक करीबन पाॅच साल से नाकामी झेल रहा था। मेरी पहली किताब एक कष्मीरी लड़की की जीवनी पर आधारित थी और उसने बहुत नाम कमाया। उसके बाद लगातार तीन विफल किताबों ने मेरा नाम लेखन जगत से लगभग मिटा ही दिया था। अपार सफलता के बाद विफलता-, आसानी से बर्दाष्त नहीं होती।
मेरी कल्पनायें लोगों को लुभाने मे बुरी तरह नाकाम रही। मेरे अन्दर कल्पना करने की ताकत ही दम तोड़ने लगी। कुछ महसूस होता था मगर उसे कागज़ पर उतारने के लिए लव्ज़ नहीं मिलते थे। निराषा मुझे पूरी तरह घेर ले, उससे पहले मुझे एक कामयाब-,रोचक और सच्ची प्रेरणा की तलाष थी। कुछ ऐसा जिसे लोग दिलचस्पी से पढ़ना चाहें।
और कुछ वक्त बाद मुझे इन्टरनेट पर ऐसी सामग्री मिल भी गयी।

जुलाई 16 षाम को लोनावला स्थित एक होटेल के बाहर मेरी टैक्सी रूकी। होटेल-सरोवर। इन्टरनेट पर इसके बारे में पढ़ा था कि ये भूतिया होटेल है। लोगों ने अपने बहुत से अदभुद और पारलौकिक अनुभव इस होटेल के बारे में साझां किये थे। मेरे लिए ये होटेल वैसी ही प्रेरणा साबित होने वाला था।
“दो सौ रूपये हो गये साहब।” टैक्सी चालक ने मुझे चेताया। मेरे जेब से पर्स निकालने से पहले ही मेरे साथी ने उसे पैसे पकड़ा दिये।
“क्या रतन? मैं दे रहा था ना?”
“अरे तू अभी लंच करा देना यार। अभी अन्दर चल!” रतन ने लापरवाही से अपना छोटा सा बैग कन्धे पर लिया और मुझ से आगे बढ़ गया।
बाहर से देखने पर वह होटेल कोई होटेल ना होकर एक बड़ा सा गेस्ट हाऊस मालूम होता था। गेट से लेकर एक पगड़न्डी जो मुख्य द्वार तक जाती थी, उसे हरे-भरे पेड़ो ने बुरी तरह घेर रखा था। यकीन नहीं हो रहा था कि इतनी नैसर्गिक जगह पर बना वह होटेल भूतिया होगा। हमने होटेल के मैनेजर से बात की और उसी कमरे के सामने के कमरे मे ठहरना तय किया जो वहाॅ की नाकारात्मक षक्ति का केन्द्र माना जाता था।
होटेल मैनेजर सुलझे व्यक्तित्व का व्यक्ति था। मैनें उससे खुलकर बात की। उसे बताया कि मेरा वहाॅ आने का मकसद ही उस होटेल के बारे में फैली अजीबोगरीब कहानियाॅ है। होटेल मैनेजर ने बताया कि जब होटेल बनने के कुछ चार-पाॅच साल तक वहाॅ ऐसा कुछ नहीं होता था, जिसे अजीब कहा जा सके, मगर एक रोज़़़़ एक औरत, जो कि पेषे से वैष्या थी, की रहस्यमयी मृत्यु के बाद वहाॅ ये सिलसिले षुरू हुए। होटेल मैनेजर को इस तरह की षक्तियों का भय नहीं था, मगर उसने फिर भी हमें वहाॅ ना ठहरने की सलाह दी, जो कि हमने मानी नहीं।
हमें यही तो प्रयोग करना था?

कमरा नम्बर 107, सुना था कि उसके आस-पास से सफाई कर्मचारी भी नहीं गुजरते थे। उसके ठीक विपरीत का कमरे में हमने अपना सामान फेंका और होटेल का एक चक्कर लगाने निकल पडे़। बिल्कुल साधारण सा होटेल था। बार-बार दिल में सवाल उठता था कि इस होटेल के भूतिया होने के पीछे कोई ठोस वजह है भी कि बस इस होटेल को यूॅही किसी कारण बदनाम कर छोड़ दिया है? अन्य होटेलों के मुकाबले वहाॅ फर्क बस इतना था कि वहाॅ का रख-रखाव थोड़ी बुरी हालत में था। आगन्तुकों की कमी झेल रहे उस होटेल का प्रबन्धन भी ढीला पड़ चुका था। षायद ही कोई कमरा भरा था, सिवाय हमारे कमरे के।
षाम साढे़ छः बजे जब हम अपने कमरे में आराम कर रहे थे, तो हमारे दरवाजे पर दस्तक हुई। रतन और मैेने तुरन्त किसी आंषका से एक दूसरे की ओर देखा। दूसरी बार भी वैसी ही दस्तक होने में मैने जाकर सावधानी से दरवाजा खोला।
“मेरे जाने का वक्त हो गया है।” सामने होटेल मैनेजर था।
”आपने बैल क्यों नही बजायी?” मैने सवाल किया
“साॅरी वह लम्बे वक्त से खराब है, और कोई ठीक करने का साहस भी नहीं कर रहा।” उसने कहा। “ये चाबी पेन्ट्री की है। जैसा कि मैने आपको अवगत करा ही दिया था कि रात को कोई आपकी सेवा के लिए यहाॅ नहंी होगा तो…।”
“आप फिक्र ना करें। हम जाकर खा लेगें।” मैने उससे चाबी लेते हुए आष्वास्त किया।
उस रोज़़़ रात नौ बजे तक रतन मोबाईल पर गाने सुनता रहा और मैं अपनी डायरी में तब तक के अनुभव उतारता रहा। लव्ज़ नहीं मिल रहे थे वहाॅ का सूनापन बयान करने के लिए। सूनापन, जो रात बढ़ने के साथ ही बढ़ता जा रहा था। वक्त बीतते एक अजीब सा खालीपन हमें घेरने लगा, मानों हम उस होटेल में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अकेले हों। मैं अपनी बालकनी से कुछ किलोमीटर दूर रोषनियों की लड़ी देख सकता था, जो कि आस-पास के घरों की थीं। उसने ना जाने क्यों एक दिलासा सी मिल रही थी।
“यार हम खाना कब खायेगें?” रतन ने अचानक कानों से एयरपीस बाहर निकालकर मेरी ओर देखा।
“चल।” मैने डायरी एक ओर रखी और पेन्ट्री की चाबी हाथ में लेकर बाहर निकल अया। दरवाजा खोलकर कदम बाहर रखते ही मेरा दिल बेवजह धक्क कर रह गया। मेरे कदम ठहर गये।
“क्या हुआ?” रतन ने पूछा
ना में सिर हिलाते हुए मुझे आगे बढ़ना पड़ा। अजीब था कि वहाॅ के ज्यादातर बल्ब खराब थे। होटेल आधा अन्धेरा और आधा रोषन था। हम दोनों ने नीचे रसोई में ही जाकर खाना खाया। वापसी में हमने षराब की एक बोतल भी वहाॅ से उठा ली। कमरे में लौटने तक कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जो कि अजीब हो। हाॅ, बस अजीब सी घुटन जरूर हो रही थी। एक अन्कही सी दहषत-, जो कि षायद इसलिए थी कि हमने वहाॅ के बारे में बहुत कुछ सुना था?
वह रात बस इन्तज़ार में ही कटती जा रही थी। हम दोनों कुछ होने के इन्तज़ार करते-करते ना जाने कब सो गये। मै अपनी कुर्सी पर ही था कि अचानक जैसे किसी ने मेरी कुर्सी को उसकी धुरी पर घुमा दिया! मैने चैंककर आॅखें खोली। रतन मुझसे कुछ चार फुट दूर बिस्तर पर बेसुध पड़ा था। ये काम उसका नहीं था। मैने अपने चारों ओर किसी को ढूॅढा।
“रतन!” मैनें उसे जगाने की कोषिष की मगर वह इतनी गहरी नींद में था कि जाग ही नहीं रहा था। मैने कई बार कोषिष की मगर वह हिला तक नहीं। इधर मेरी घबराहट बढती जा रही थी। मैने पूरे कमरे, यहाॅ तक कि बालकनी और बाथरूम तक में उसे ढूॅढा जिसने मेरी कुर्सी को घुमाया था, मगर कोई नहीं मिला।
वह रात ऐसे ही गुजर गयी।
अगला दिन हम आस-पास के इलाके में उसी होटेल से जुड़ी कुछ और जानकारियाॅ जमा करते रहे। और फिर दूसरी रात मैं और रतन होटेल में तन्हा थे। रतन ने मुझे पिछली रात के बारे में बताया, कि जिस वक्त मैं उसे जगाने की कोषिष रहा था, तब वह मेरी आवाज़ साफ सुन सकता था लेकिन उसके षरीर को जैसे किसी ने जकड़ रखा था। मुझे उसकी बात पर यकीन था, नहीं था मुझे याद नहीं। मैने किसी नतीजे पर पहुॅचने की कोषिष नहीं कि क्योंकि मैं वहाॅ कहानी के लिए था। जो जैसा है, उसी के बारे में लिखना चाहता था, अपनी कोई राय बनाकर नहीं।
किसी हरकत और घटना के इन्तज़ार में उस रात हम सोये नहीं। कुछ खास तो नहीं हुआ, बस कभी-कभी किसी के बुदबुदाने सी आवाज़ दूसरे कमरे से आती रही। हमें इतने भर से तस्सली नहीं थी। किसी वहम या षक के चलते मैं कुछ नहीं लिखना चाहता था। मुझे सच चाहिये था, अपने सामने-, समक्ष।
रात के तीन बज चुके थे, और अब पलकें हमारी मर्जी के खिलाफ होने लगीं। “मुझे लगता है कि हमें उस कमरे में ही जाकर देखना चाहिये।” मैने रतन से कहा तो वह घबरा सा गया।
“पगला गया है क्या?? याद नहीं कल रात क्या हुआ था?”
“हाॅ लेकिन आज तो कुछ नहीं हो रहा ना? और अगर कुछ है तो वह पूरे होटेल में है। हम महफूज़ तो यहाॅ भी नहीं है मेरे दोस्त।”
“लेकिन वहाॅ जाकर हम करेगें क्या?”
“आह्वाहन।”
“आह्वाहन?” उसने दोहराया। “कैसे? हम कोई ओझा हैं?”
मैने एक पल को सोचा। “मैं नहीं जानता, मगर ऐसे ही पुकार लेगें। जिसे आना होगा, इतने में ही आ जायेगा।”
मेरे मनाने पर रतन राजी हो गया। उसे लगा कि मुझे बस लिखने के लिए कुछ मिल गया तो हम अगले ही दिन उस मनहूस जगह से रवाना हो जायेगें। मैंने भी यही तय किया हुआ था-, बस थोड़ी देर हो गयी थी मुझे।
कमरा नम्बर 107, उसकी चाबी नहीं थी हमारे पास, और उसकी जरूरत भी नहीं पड़ी। होटेल मैनेजर ने सख्त हिदायत दी थी कि हम उस कमरे की तरफ देखें तक नहीं। हमें सब याद था, मगर बस हम जैेसे खुद में थे ही नहीं।
मै आज भी अपनी आॅखों के सामने महसूस कर सकता हूॅ वह कमरा। जालों से पटा हुआ। पर्दो और दीवारों पर पडी धूल ने उनका रंग की धूमिल कर दिया था। फर्ष पर धूल की गाढ़ी पर्त। अजीब सी बू और एक मनहूस सी खामोषी। साहस तो नहीं था, मगर हमनें वहीं थोडी सी छानबीन करने की सोची। बडी़ मुष्किल से वहाॅ एक दराज में एक डायरी मिली। जिसमें कुछ मन्त्र लिखे हुए थे। एक विधी लिखी हुई थी। षायद वह कोई प्रयोग था एक नयी जिन्दगी पाने का।
“क्या हमें इसे आज़माना चाहिये?” मैने रतन से सवाल किया
निचला होठं दाॅतों से काटते हुए उसने दो पल विचार किया। “कुछ नहीं होना। बेकार की बात है। तेरा मुआयना हो गया हो तो वापस अपने कमरे में चलें?”
“एक बार कोषिष करने में क्या हर्ज है? कुछ नहीं हुआ तो भी मुझे लिखने के लिए तो कुछ मिल ही जायेगा ना?”
रतन ने माथा ठोक लिया था, मगर मुझे इन्कार नही किया।
उस डायरी के अुनसार हमें कुछ सामान चाहिये था जैसे कि नींबू-,काला कपड़ा-, मकडी का जाल-, एक कटोरा पानी-, माॅस या खून का कतरा और भी बहुत कुछ। सब कुछ होटेल की रसोई में उपलब्ध था।
रात साढे तीन बजे वहीं फर्ष पर बैठकर हमने विधी षुरू की। ये किसी तरह का आह्वाहन था। हमने मंन्त्र पढे। वह सब कुछ किया जो कि डायरी में लिखा गया था, और अन्त में बारी आयी अपने खून की एक बूॅद नीबू पर टपकाने की। हाथ में चाकू थामें में एक बार को रूक गया, और फिर याद आया कि यदि मैं यहाॅ का सच ले जाकर बाज़ार में बचूॅगा, तो रातों-रात मेरा नाम चाॅद-सितारों सा झिलमिलाने लगेगा। मैं उस होटेल का सच जानने को इतना आतुर था कि मैने बिना सोचे ऐसा कर दिया। फिर बारी थी रतन की, लेकिन वह नहीं कर पाया।
“रतन तुझे करना पडे़गा यार-, नहीं तो कुछ भी हो सकता है तुझे।”
वह घबरा गया। पीछे सरक गया। “नहीं! मैं खुद का हाथ नहीं काटने वाला। तू पागल हो गया है, मैं नहीं।”
“लेकिन हम इसे बीच में नहीं छोड़ सकते। ऐसा ना करने पर तुझे कुछ हो गया तो? मेरी तरफ देख-, मैं ठीक हूॅ यानि ऐसा करना सुरक्षित है।”
मेरी दलीलों का उस पर कोई असर नहीं हो रहा था और सिर्फ मैं जानता था कि मेरे सामने की सारी दुनिया तेजी से घूमने लगी थी। मेरा सिर चकराने लगा था। “रतन।” मै बस इसके आगे कुछ बोल नहीं पा रहा था, और फिर उसी वक्त मैं वहीं जमीन पर औंधा गिर पड़ा।
आखिरी दृष्य जो मैने देखा था उसमें एक अन्जान औरत मेरे सामने खड़ी थी, जिसकी छवि किसी जंगली-पिछड़ी जनजाति की थी, और रतन कमरे के दरवाजे से बाहर की ओर भाग रहा था।
दो महीने बाद मेरी किताब प्रकाषित हुई, कमरा नम्बर 107 के नाम से। एक प्रसिद्ध किताब, जैसी कि मैं चाहता ही था। लोगों ने उसे बहुत पसन्द किया। बहुत नाम कमाया मेरी उस किताब ने। वजह थी कि ये कल्पना पर नहीं, बल्कि सच के ठोस धरातल पर खड़ी थी। वजह थी, कि उस होटेल में रहस्यमयी नाकारत्मक षक्ति का होना साबित हुआ। वजह थी कि उसके रहस्यों में एक और रहस्य जुड़ गया था- कमरा नम्बर 107 में एक लेखक की रहस्यमय मौत।

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