ना तो आज कोई कविता सूझ रही है,
ना कोई छन्द, मन में चल रहे अनेको द्वन्द्व ।।

वक्त नही यह क्रंदन का,
ना करना तुम अफसोस।
आग्रह, अनुरोध व्यर्थ है,
लेना होगा उसका प्रतिशोध ।।

बचपन में सुनी थी कविता,
आज जीवंत हो गई ।
खेल-खेल में प्यारी ट्विंकल;
ट्विंकल लिटिल स्टार हो गई ।।

दिखे भेड़िये जिस भी रूप में,
सरेआम उन्हें उल्टा लटकाओ।
मृत्यु दंड नहीं है पूर्ण सजा,
पल-पल मरे, ऐसा पाठ पढ़ायो।।

बेटी बचाओ! सब है बेकार की बातें,
पहले बेटों को तहजीब बताओ।
आखिर किससे बचाना है बेटी को??
जाकर उसको सबक सिखाओ।।

बहुत हो चुकी प्रलोभन भरी बातें,
मुद्दे की यह बात सुनाओ ।
रूह भी कांपे हर पापी की,
सख्त से सख्त कानून बनाओ।।
-नेहा अवस्थी

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