मातृभाषा का महत्त्व

मातृभाषा का महत्त्व

ये कहानी है एक ऐसी शिक्षिका कि जो  बॉर्डर के पास स्थित एक स्कूल में पढ़ाती है। उस स्कूल में 50% विद्यार्थी उस इलाके के है तो 50% वहाँ नौकरी कर रहे आर्मी और बी.एस.एफ.वालो के है। उस स्कूल की प्रत्येक कक्षा में 15-16 प्रांतो के बच्चे एक साथ बैठते है। शिक्षक- अभिभावक सभा वाले दिन तो स्कूल ऐसे लगता है जैसे कोई राष्ट्रीय उत्सव हो।  बहुत से अभिभावक तो ड्यूटी से एक घंटे की छुट्टी लेकर वर्दी में ही आते है।  दो- तीन घंटे यहाँ रुकते है और फिर कही  ओर चले जाते है।  वह नर्सरी कक्षा को पढ़ाती है।  पढ़ाती क्या है, मस्ती करती है।

उसे 3-3 साल के छोटे छोटे बच्चे को पढ़ाना होता है। गत वर्ष उसकी कक्षा में आन्ध्र प्रदेश के  एक छोटे से गांव से सम्बंधित परिवार का एक प्यारा सा बच्चा आया – ओलिन। ओलिन का रंग पक्का, शरीर भरा हुआ, बड़ी बड़ी काली आँखे, गोल चेहरा और तंदरुस्त काया थी।  शैतानी इतनी करता कि रोज डांट खाता था और उसके बाद जो शक्ल बनाता था चाह कर भी कोई अपनी हँसी रोक नहीं सकता था फिर वो तो वैसे ही बहुत संवेदनशील थी कि खिलखिला कर हँस पड़ती।  वो और ओलिन दोनों एक दूसरे की भाषा से अनजान थे इसलिए संवाद शुरुआत में इशारो से होता था ।  ओलिन अपनी बातों को इशारो से समझाना अच्छी तरह सीख गया था।  जब भी उसे प्यास लगती अपनी बोतल उसके पास ले जाकर जोर से उसका ढक्कन घूमता और वो समझ जाती। लघुशंका के लिए भी अपनी कनिष्ठिका का प्रयोग करना उसे आ गया था।  फ्रूट ब्रेक के लिए भेजे गए फल तो वह सुबह आते साथ ही चट कर जाता था । माजा(आम रस) की की पूरी एक लीटर की सील पैक बोतल लाता और  छुट्टी के समय गटर में बहा देता था।

खाने में रोज इडली या डोसा, सांबर और नारियल की चटनी के साथ आता, जिसे वो टिफ़िन से निकाल कर बैंच पर फैला कर खाता था।  ओलिन से ज्यादा बैंच उसका खाना खाते थे।
जब उसे स्कूल में  आये हुए करीबन दो हफ्ते बीत चुके थे, और उसने पहली बार एल फॉर लीफ बोला था तब वह कितनी खुश हुई थी और अपनी सहअधियापिकाओ को भी बताया की ओलिन हमारी भाषा सिखने लगा है।
पहली शिक्षक- अभिभावक सभा वाले दिन जब वह उसकी मम्मी से मिली तो उसे पता चला की उसकी मम्मी एक अच्छी सुशिक्षित महिला है। तब उसने उनसे पूछा था, “मैडम, आप हिंदी और अंग्रेजी  दोनों भाषाओ का बाखूबी ज्ञान रखती है, तो फिर आप इससे हिंदी या अंग्रेजी में बात क्यों नहीं करती।”

फिर जो ओलिन की मम्मी ने जवाब दिया उसे सुनकर वह दंग रह गई।  उन्होंने कहा, “ मैडम जी, हिंदी,अंग्रेजी और अन्य जो भी भाषाएँ आपके स्कूल में बोली जाती है या सिखाई जाती है; वो सारी भाषाएँ तो ये आप लोगो के बीच रह कर 3-4 महीनों में अच्छे से सीख जाएगा लेकिन यदि मैं भी इसके साथ इसी भाषा में बात करुँगी तो यह अपनी मातृ भाषा नहीं सीख पाएगा और फिर जब हम अपने गाँव वापिस जाएंगे तो यह अपने दादा-दादी, नाना-नानी आदि से बात नहीं कर पाएगा और फिर वह उनके किस्से कहानियां नहीं सुन समझ पाएगा, जिससे कि इसके और इसके अपनों के बीच प्यार का रिश्ता नहीं पनप पाएगा।  इसका अपनी संस्कृति के प्रति लगाव नहीं होगा और जब ये अपनी संस्कृति ही नहीं जानेगा तो अन्य संस्कृतियों के साथ इसका जुड़ाव कैसे होगा । घर से दूर होने पर अब मेरी यह जिम्मेदारी बनती है कि मैं ओलिन को उसकी भाषा सिखाऊ और इसे इसके घर, परिवार और संस्कृति से जोड़े रखूं और इसका माध्यम केवल मातृभाषा है।  बाकी दुनिया से तो आप इसकी पहचान करवा ही देंगी। ”
शिक्षिका व अन्य अभिभावकों ने खड़े होकर ओलिन की मम्मी के लिए तालियां बजाई , वहां आए आर्मी अधिकारिओं ने ओलिन की मम्मी को सैल्यूट किया।
ओलिन की शिक्षिका ने कहा, “मैडम शायद डिग्रियां मेरे पास आपसे अधिक होंगी पर आपके विचार सच में कितने महान है।  आज  आपने बहुत बड़ी शिक्षा हम लोगो दी। ”

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