बचपन

बचपन

अब इस दिल में क्या छुपा रखा है,
सिर्फ मेरा बचपन ही छुपा रखा है ;
पलट के देखा, इस जिंदगी को,
वही शैशव की मीठी यादें छुपा के रखा है।
आज फिर याद आया।

प्यारे हैं अफ़्साने, जो सुने थे अपनों से
प्यार क्या होता है, ये अम्मा ने समझाया,
जुनूं न जाने कैसा था , जो दिल पे छाया
फिर गलियों का वो हुड़दंग याद आया

रोज सवेरे घरों के दरवाजे गेंद से खटकाना,
वो नुक्कड़ पर छोटी सी फिर सभा लगाना;
फिर खट्टी मीठी नोक-झोंक फिर अनूठा प्रेम दिखाना,
वहीं कचौड़ी, जलेबी से दिन की शुरुआत करना,
लौट कर घर आना फिर पढने को जाना,
फिर टीचर का झटपट समझाना, और कुछ भी समझ न आना;
आज बहुत याद आया।

रात को दादी की मलमल गोद मे सोना,
सपने में परियों का रोज आना,
फिर पापा के डर से जल्दी सो जाना;
फिर स्कूल वाली कोचिंग में अपना ग्रुप बनाना,
ये तेरी वो मेरी कहके सबका दिल बहलाना,
उसकी एक्टिवा और अपना पैदल होना,
और पीछे बैठ उसको पैर मारना,
उसका पीछे मुड़कर देखना झट नाम दूसरे पर रख देना;
आज बहुत याद आया।

लेकिन मेरी जिंदगी इस भँवर से बेखबर थी,
और आज दिल में बचपन ही छुपा रखा है;
शायद आज भी बचपन की ख्वाहिशें,
आज भी “खत” लिखती तो हैं मुझे…….,
शायद बेखबर इस बात से हैं की
वो जिंदगी अब इस “पते”पर नही रहती।

कुमार हर्षित

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