सूना घर

सूना घर

घर सूना हो गया
खाली समय अब दूना हो गया
वो जो पड़ी थी बरामदे में एक चारपाई
हंसती है मुझपे मुँह चिढ़ाती है वो
क्यों नही हटा पा रहीं हूँ मैं
वो जो खटकती थी आंखों को दिन और रात
और वो जो जाने को तत्पर एक कृशकाय देह
जो ज़िम्मेदारी से ज़्यादा मुझको लगती थी बोझ
हर पल निहारती वो एक जोड़ी आंखे
होती ही नहीं थी बंद उनकी बरसातें
सजा संवरा सा पूरा मेरा घर,
बस एक यही कोना रहा था मुझको अखर
फिर क्यों नही सजा पा रहीं हूँ ये कोना
आज समझ में आया किसी रिश्ते का होना
अब लग रहा है घर मुझको सूना सूना।

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