है बोध सत्य का सबको यहां,
साहस ना किसी के पास है ।
दुर्योधन को मिल रहा बढ़ावा,
हम सभी में इक धृतराष्ट्र है।।
मूक श्रोता का रूप धरे सब,

संजय की दृष्टि पर विश्वास है।

क्षत-विक्षत हो रहा है  जीवन,

“मुरलीधर” से ही बस आस है।।

-नेहा अवस्थी मिश्रा –

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