उम्र गँवा दी

उम्र गँवा दी

उम्र गँवा दी मैंने
अपने आँसुओं पर
मुस्कुराहटों का पर्दा गिराते
अपना दर्द सीने में छुपाते
किसी का दिल न टूट जाए
कहीं कोई मुझसे न रूठ जाए
यही सोचते मनाते
क्या कहूँ ! क्या छुपा लूँ !
कैसे चेहरे पर आने से
उन भावों को बचा लूँ !
कहीं दर्द ज़ाहिर न हो जाए
दिल के किसी कोने का
फ़र्ज़ निभाती रही
बहन ,बेटी ,पत्नी ,माँ होने का
बस यूँ ही उम्र गँवा दी मैंने।

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Manju Singh

बीस वर्षों तक हिन्दी अध्यापन किया । अध्यापन के साथ शौकिया तौर पर थोडा बहुत लेखन कार्य भी करती रही । उझे सामजिक और पारिवारिक इश्यों पर कविता कहानी लेख आदि लिखना बेहद पसन्द है।

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