ज़िन्दगी अहसान कर, क्यों इतना परेशान करती है,
आसान कर जीना थोड़ा सा, क्यों इतने इम्तहान रखती है।
घिरे रहते हैं असमंजस में, चक्रव्यूह सा लगता जीवन,
कशमकश के दौरे चलते, भारी – भारी सा रहता मन।
बड़े तजुर्बे दे दिए तूने, परिपक्व कर दिया तूने मुझको,
अब थोड़ा बचपन भी दे दे, झंझट नहीं चाहिए इतने मुझको।
चाहा करूँ मैं बचपन में खोना, जहाँ नहीं है कोई दिखावा,
बस अपनापन हो हर जगह, जहाँ दौलत का नहीं कोई चड़ावा।

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