जिसको राखे साइयाँ मार सके ना। कोई।।
प्रातः कालीन का नजारा बेहद सुंदर और आकर्षक था,
हरी हरी घास अपने पूरे यौवन में लहलहा रही थी और ठंडी – ठंडी
हवा के झोंके सबको आनंदित कर रहे थे।
तभी भूख और प्यास से तड़पता हुआ एक गधा जंगल की ओर निकला और हरी घास को देखकर उसका मन प्रफुल्लित हो गया।
उसको ऐसा लगा कि आज मेरी भूख मिट जाएगी और जैसे ही वह घास की तरफ बढ़ा एक चीते के ऊपर उसकी नजर पड़ी वह उसे देखकर भयभीत हो गया और दूसरी तरफ देखा तो वहां पर बब्बर शेर नजर आया वह बहुत ही ज्यादा डर गया उसे लगा आज मैं नहीं बच पाऊंगा ।
मगर चीता और बब्बर शेर दोनों उसको खाने की सोच रहे थे,
तभी दोनों ने फैसला लिया कि एक को मार दिया जाए तो मुझे पूरा गधा खाने को मिल जाएगा,
तभी दोनों आपस में भिड़ गए और दोनों को गंभीर चोटे आई और दोनों घायल हो गए इस मौके का फायदा उठाते हुए गधा वहां से भाग गया और उसकी जान बच गई तभी कहते हैं।।
जिसको राखे साइयां मार सके ना कोई

श्याम जी गुप्ता फतेहपुर

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