नोट- जब शादी के बाद पहली श्रावणी अमावस्या को एक नववधु का पति परदेश से पहली श्रावणी मावस मनाने भी नहीं आता तो नववधु की मन:व्यथा का गीत:

-:गीत:-

बादली घणी-घणी बरसी र म्हारा बालम, घणी जोर बरसी!शा

दी पाछ को पहलो ही सावण -2, घणी -घणी तरसी र!

बादली घणी-घणी बरसी,,,,,

जेठ असाढ ये बीता पाछ,मनभावण सावण आया!
ठण्डी चले पुरवाई साजण, अर काला बादल छाया!
घणघोर घटा जब बरसण लागी,घणी-घणी तरसी र,,,,
बादली घणी-घणी बरसी,,,,,,,,,,,(१)

संग की सहेल्याँ सगलीपरणी, वाकां साजण, आया!
म्हारा पीया जी भी ,आवगा, मैं भी सुपणा सजाया!
सगली सहेल्याँ हरषी बालम,बिन थारअ मूँ तरसी!
बादली घणी-घणी बरसी,,,,,,,,,,(२)

पहली बून्द पडी़ तनडा़ प, ठण्डक सी या लागी!
घणी भुलाणी छाही ही, पर यादाँ थारी आगी!
सूखी आख्याँ मरूथल सी जी,सावण सी जा बरसी!
बादली घणी-घणी बरसी,,,,,,,,,,,,(३)

आव सावण भादवा कतना,अर कतना ही बरस!
जोडी़ बणाव मालिक ज्याँकी,हरदम संग म हरष!
कदी न तरस बिरहणी इतणी,जितणी र मू तरसी!
बादली घणी-घणी बरसी,,,,,,,,,,,(४)

गीतकार-  दिनेश कहार’समर्पित’

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *