चमकी का प्रकोप

चमकी का प्रकोप

श्रद्धांजलि

दहशत का हर ओर यह आलम है,
डेंगू, जीका, चमकी कर रहे तांडव है।
घोर विपत्ति की घड़ी आयी है
मां के हाथ लालन की परछाई है।
दिल तड़प उठा,
रूह भी घबराई है।
सूनी मां की गोद देखकर,
आंख मेरी भर आयी है।
निष्ठुरता की पराकाष्ठा देखो,
स्कोर पे नज़रे लगायी हैं।
निगल गया घर के चिराग को,
लीची पर तोहमत लगायी है।।

-नेहा अवस्थी मिश्रा

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Golden Ray A Sunahri

-होम्योपैथिक चिकित्सक -रेकी मास्टर -कविता लेखन

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